Monday, 26 August 2013

The Delusion of Equality

In May 2013, Forbes magazine ranked two Indian women amongst the top 10 most powerful women in the world. While this remains true, here in India we have had cases like the Delhi rape case or the currently fizzing case of IAS officer Durga Shakti Nagpal. However, both of these facts mark the two extremes of the situation in hand.

Today (26th of August) most Hindu mothers in the northern part of India are fasting without a grain of food and a drop of water for the safety and prosperity of their sons, though I have my doubts if any of these sons is doing the same for his mother. A few days from now Hindu married women will again fast for one full day without food and water for the long life of their husbands. And once again none of these husbands would be doing the same.

These are just two of the innumerable number of fasts that women keep for the males in their lives. And without the slightest hint of doubt I can claim that there are no such religious customs for men. Let alone Hinduism, no Muslim male has to wear a 'burkha' but a pious Muslim woman is required to be veiled inside one. These are just a few entries in the infinitely large list of inequalities in religious practises towards women.



On one hand we talk about women empowerment and on the other, we investigate and charge a woman for going to a temple while she was undergoing her menstrual cycle (http://genderbytes.wordpress.com/2010/12/17/is-it-a-crime-to-menstruate/). The whole hypocrisy of equal rights for women and women empowerment is based on the mind set that women are the weaker sex. They are forced to accept this not only physically but psychologically as well.

How can we ever expect a girl to grow into a woman immune to any gender bias when she has always had her mother in front of her who is fasting for her father and brother and never have them do the same ? Why will a girl feel equal when there are different sets of governing rules for her brother and herself? Forget about equality, why will she ever feel human when she is considered to 'pollute' God because of some biological phenomenon ?

Putting up boards in public transport yelling “for ladies only” is not the solution to bridging the divide between men and women. If the society is really serious about this issue, resolutions and laws need to be passed at the family level. We need to make sure that our daughters in no way feel inferior to their brothers. If not so, Forbes top 10 list will surely have a few more Indian women but the common Indian women will be further clutched in the shackles of patriarchy.

Sunday, 18 August 2013

Am I an Indian ?


भारत को आज़ाद हुए 67 साल हो गए हैं पर आज भी हम भारतीय होने से पहले बिहारी, मराठी, गुजराती, तमिल इत्यादि हैं| आज भी हम उत्तर या दक्षिण भारतीय हैं| जिस समय सरदार पटेल और वी. पी. मेनेन भारत के अनेकों टुकड़ों को मिलाने की कोशिश कर रहे थे उस समय उन्होंने यह कलपना भी नहीं की होगी के वो सिर्फ भूमिखंड को ही मिला रहे हैं, लोगों की मानसिकता को नहीं।
 
मेरे कॉलेज में एक चाय की दुकान है जिसके मालिक श्री संपत लाल हैं लेकिन वे ख़ुद को 'SAM' कहलाना पसंद करते हैं| उन्हें अगर आप भैया कह के संबोधित करें तो वे बुरा मान जाते है। लखनऊ जैसी जगह से आने की वजह से शुरू शुरू में उन्हें 'SAM' बुलाना बहुत मुश्किल होता था पर जैसे जैसे वक़्त बीता मैं भी उन्हें इसी नाम से पुकारने लगा. 'SAM' सभी विद्यार्थियों के साथ ऐसे पेश आते हैं जैसे की वो उन्ही की आयु के हों, हँसी-मजाक भी कुछ उसी अंदाज़ में चलता रहता है उनके साथ|

कुछ २ दिन पुरानी बात है यह, मैं उनके पास चाय लेने गया, वे कुछ खुद में ही मगन से थे और मैं भी कुछ दोस्तों के साथ इठलाया सा घूम रहा था| उनके एक दो बार न सुनने पर उनके अनोपचारिक मिजाज़ का फायदा उठाते हुए चुटकी बजा के उन्हें बुलाना चाहा। उन्हें यह बात बिलकुल भी पसंद नहीं आई और वे रोषित हो उठे. कुछ आपत्ति जनक बातें भी कह डाली पर क्योंकि वो मुझसे बड़े हैं मैंने कुछ नहीं कहा,  बात मज़ाक में टाल दी पर शायद उस दिन 'SAM' के अन्दर के श्री संपत लाल जाग उठे थे, वे कुछ और भी बोले पर अब मेरा भी इठलाना कम होने लगा था| लखनऊ का हो कर कोई और मुझे तमीज की तालीम दे रहा था यह शायद मेरे अहम् को रास न आया| 

इस सब गहमा गहमी के बीच वे बोले, "don't behave like cheap biharis" (सस्ते बिहारियों की तरह न पेश आओ)| यह  बात कुछ चुभ सी गयी मुझे। मेरी किसी हरकत से किसी राज्य या उसके लोगों को कैसे जोड़ा जा सकता है? आखिर ऐसा क्या ज़्यादा है गोवा के लोगों में जो बिहार वासियों में नहीं? वे भी तो उतने ही भारतीय हैं जितना कोई और| उन्होंने ने भी भारत की आज़ादी या उसके विकास में उतना ही योगदान दिया है जितना किसी और ने| बल्कि मुझे कोई हिचक नहीं है यह कहने में कि शायद बाकियों से थोड़ा ज़्यादा ही दिया होगा। आखिर अखिल भारतीय सेवाओं में वे एक अरसे से बाकि किसी भी राज्य से कहीं आगे हैं|

बात यहाँ यह नहीं है के कौन ज़्यादा महान है, बात यह है कि यह विचार
कितनी बड़ी प्रलय ला सकता है इसकी कलपना करना भी मुश्किल है| भारत देश तो वैसे भी एक बहुत ही झल्ली दार विचारधारा  'अनेकता में एकता" पर बुना हुआ है और "cheap  biharis" जैसे विचार के बीज इसे मिनटों में अलग-थलग कर सकते हैं| मेरी तो बस आप से एक ही विनती है कि लोगों को उनकी भाषा, उनके पहनावे अथवा उनके जन्म स्थान के तराजू में रख के न तौले। सदैव याद रखे कि हम सब इस महान भारत भूमि पर जन्में हैं और हम सब एक हैं| अगर कोई राज्य या उसके लोग किसी दुसरे राज्य से पिछड़े हैं तो यह हम सबकी ज़िम्मेदारी है कि हम अपने भाईयों की हर मुमकिन सहायता करें और उन्हें बराबरी में लायें। हमेशा याद रखें के विश्व में हमारा वजूद गोवा या बिहार से नहीं बल्कि भारत से है|

अगर अपना ना सही तो अपनी आने वाली पीढ़ी का ख्याल करे, कि उन्हें भी उतना ही महान और अखंड भारत देखने को मिले जो आपके पूर्वज आपके लिए छोड़ के गए थे|

Sunday, 7 July 2013

The Intern's Speech

Life in Microsoft as an Intern

I joined MS-IT as an intern on the 20th of May. Quite like any other intern was awe struck the moment I stepped out of the bus and saw the bold Microsoft title on top of the IDC building. Finally it took a guard’s pestering for an ID-card to bring me out of this lotus land of mine. Then came another shuttle to take me to the MS-IT building. Wading through this mini Amazon forest I finally reached the MS-IT reception.

The 1st thing that caught my eye was its astonishing resemblance to a Delhi metro station. I mean the gates. Once through the barricade there were these amazing touch laptops. I was filled with hope that probably I would be given one. Though this hope did not last long, as I was given an obese plug n play machine. Plug and play because it has no battery in it. By the time day 1 came to an end I had familiarized myself with the free coffee, pool, table tennis and the much needed taxi rides.


Every day ever since has been simply amazing. Meeting new people, learning new stuff and how can I not mention the extremely perplex Microsoft argot. Thankfully a fellow intern told me about this site called MS collections, how else would have I ever decrypted most of the calendars* here which are predominantly either WFH or OOF**.

But these 5 weeks were not just about technical stuff. They have morphed me into a more confident person. And most of all have made me realize the power of dreams. Once a mere entity in my dreams, today this ID-card is a reality.

I would like to end with this beautiful nazm by Javed Akhtar Sahab:

ख्वाब हैं तो मंजिलें हैं...
मंजिले हैं तो फासले हैं...
फासले हैं तो रास्ते हैं...
रास्ते हैं तो मुश्किलें हैं...
मुश्किलें हैं तो हौसला है..
हौसला है तो विश्वास है....


Thank you!

*here i am refering to every employee's outlook calender.
**WFH: Work From Home
    OOF: Out of Office

Tuesday, 25 June 2013

कभी तो खुल के बरस अब्र-ए मेहरबां की तरह

बाहर इस ऋतु की पहली बारिश हो रही है। महीनों बाद आज यह शब-ए-वस्ल आ ही गई जब धूप से झुलसी धरती में बारिश की बूंदों ने एक नयी जान सी फूँक दी। इस बड़े से कांच के उस पार जहाँ यह अनोखा मिलन हो रहा है वहीँ इस तरफ समां सिर्फ कीबोर्ड की खिट-पिट से गूँज रहा है। हर कुछ देर में सी.सी.डी. की चाय वाले उपकरण से भांप छोड़ने की आवाज़ आती है। इससे पहले आप और भ्रमित हों आपको बता दूँ कि यह दुनिया की एक सबसे बड़ी कंपनी का दफ्तर है। इस कंपनी ने दुनिया बदल के रख दी है। अगर आप इस वक़्त ये पढ़ रहे है तो शायद ये इसी कंपनी की देन है।

यहीं पर सफ़ेद चूड़ी दार सलवार कुर्ता पहने सावित्री जी हैं जो कि डेटाबेस की query में कहीं खोई हुई हैं। मध्य प्रदेश के भोपाल जिले की रहने वाली हैं वे। शादी हुए शायद २ या ३ साल हुए हैं और एक प्यारा सा बेटा भी है। पर कहीं न कहीं उनके माथे पर सिर्फ यह डेटाबेस की query ही नहीं पर जीवन की और भी परेशानियों ने लकीरों के रूप में डेरा डाल रखा है। शायद सुबह सासू माँ से कुछ कहा सुनी हो गई है या शायद कल देर से घर पहुँचने के कारण उनके पति पपर्मेश्वर ने कुछ बुरा कह दिया था।


दूसरी ओर बैठती हैं नेहा जी। कंपनी में नौकरी करते हुए अभी एक साल भी नहीं हुआ है। सुबह जल्दी ही आ जाती हैं और देर रात त
क काम करती हैं। पर अपनी उम्र के हिसाब से कुछ कम ही हंसती हैं। छुट्टी के दिन भी ऑफिस आती हैं। शायद अपने जीवन के अकेलेपन को ऑफिस के काम से भरने की कोशिश करती हैं।

उन्ही के बगल में कमलेश जी बैठते हैं। अभी शायद 40 वर्ष के ही होंगे पर 60 के नज़र आने लगे हैं। कमर के दर्द के बावजूद रोज़ आकर इस काली अकड़ी हुई कुर्सी पर बैठ जाते हैं। अकसर अगल-बगल वाले लड़के-लड़कियों पर झुंझुला उठते हैं। और शायद यह सही भी है, कई सालों से तरक्की नहीं मिली उन्हें। पर जो भी हो बड़ा ख्याल रखते हैं सबका। अकसर घर से मिठाई ला कर बाटते हैं।

ऐसे अनेकों लोग हैं यहाँ, पर शायद अभी तक किसी ने भी बाहर कुदरत की इस अनोखी बेला पर ध्यान नहीं दिया हैं, बाहर जा के इस अनोखे जश्न में शामिल होना तो दूर की बात है। शायद सिर्फ शनिवार को ही वे इस उल्लास को महसूस कर पाते हैं, पर बाकि दिनों का क्या? इस रोज़ मर्रा की भाग दौड़ ने कहीं ना कहीं बड़ी जल्दी ही इन सबके मनोस्थल को इस पथरीली झुलसायी हुई बंजर ज़मीन सा कर दिया है। सी.सी.डी. के उपकरणों से निकली हुई चाय और कॉफ़ी कब तक इस हकीकत से इन्हें दूर रखेगी यह देखने लायक होगा।

इन सब लोगों के बीच बैठे और अपने इस चमकीले उपकरण को देखते हुए मेरे अंतर मन में बस एक ही विचार गूँज रहा है, 'क्या यही हश्र होने वाला है मेरा?' बहरहाल मेरा जो होगा सो होगा अभी तो बस यह ही कामना है के इन सबके मन के सूखे पर जल्दी ही मेघराज मेहरबान हों और खुल के बरसा दे अब्र-ए-उल्लास को।

Sunday, 5 May 2013

कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है।


सपने, आशाएँ, चाहतें , इच्छाएं, ये वो शब्द हैं जो अक्सर ऐसी घटनाओं को परिभाषित करते हैं जिनका घटना मुश्किल या फिर नामुमकिन होता है। भगवान बुद्ध सिखा गए के इच्छा ही सब दुखों का कारण है। पर यह पूर्ण सत्य नहीं है। जो उल्लास इन सपनों को बुनने में है उसे क्यों नज़रंदाज़ किया जाता है। 

हर कामना के पीछे का भाव एक ऐसी अनुभूति होती है जिसे पहले महसूस न किया गया हो। स्वप्न लोक में उस अनुभूति का सुख शायद पृथ्वी लोक से कई गुना बेहतर होता है। और ऐसा हो भी क्यों ना, आखिर स्वप्न लो
क की हर घटना पर आप का नियंत्रण होता है। हर भावना ठीक वैसे ही व्यक्त होती है जैसा आप उसे महसूस करना चाहते हैं।

पर आप सोच रहे होंगे के यह कैसे हो सकता है, "अगर हर स्वप्न के पीछे का मूल भाव एक ऐसा अनुभव है जो मुझे पहले हुआ ही नहीं, फिर मैं कैसे उसे महसूस कर सकता हूँ, या उसे कैसे नियंत्रित कर सकता हूँ?" इस प्रश्न का उत्तर है आपके जीवन की संचित अनुभवों में या उनके सुने और पढ़े गए वर्णन में। मसलन, अगर आपने शराब कभी न पी हो फिर भी आप उसकी मैकशी का अंदाज़ा लोगों के वर्णन से लगा सकते है। 

इच्छा खुद में कभी निराश नहीं करती। किसी भी इच्छा का जन्म या फिर उसकी पूर्ती की कल्पना बेहद हर्षित करती है। घंटों खयाली पुलाव पकाने में जो आनंद है वह शायद उस सपने के सच हो जाने में नहीं। रोज़ मर्रा के जीवन से हट कर इस खयाली दुनिया में खो जाना बेहद सुकून देने वाला होता है। अगर हर कामना सच होने लगे तब फिर यह खयाली दुनिया का अस्तित्व ही ख़त्म हो जायेगा। इस जिंदगी की जीवंतता ही मिट जाएगी। 

आशा करता हूँ यह पढ़ते हुए आप भी ऐसी ही अपनी किसी कामना के बारे में सोच रहे होंगे। अपने विचार उसकी पूर्ति पर ना केन्द्रित कीजिये, बस चंद लम्हे अपनी इस आशा के साथ बिताइये। उन खयाली महलों में खो कर आनंद का अनुभव कीजिये। मुझे विश्वास है के अब तक आपके चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान ज़रूर छलक आई होगी।  

Tuesday, 23 April 2013

आते हैं गैब से ये मज़ामीं ख़याल में


इस लेक्चर में मैं हमेशा सोता हूँ, पर ना जाने क्यों आज आँख नहीं लग रही है। इधर-उधर देखाता हूँ तो ये ख्याल आया के शायद मेरे जैसे और भी हैं यहाँ। इनमे से कितने अपने मन में अपने ही रंगों से सुसज्जित किसी दुनिया में खोये हुए हैं। आइये इन ब्रह्माण्डों की सैर करें। 


दूर उस कोने में एक चटक लाल रंग की टी शर्ट पहने वो जो लड़का बैठा है पता नहीं तबसे छत की ओर क्यों देख रहा है। शायद खुली आँखों से कोई ख्वाब बुन रहा है। उसके पीछे वो अजीब से बाल वाला, कब से क्लास की दूसरी ओर बैठी उस लड़की को देख रहा है। हर क्लास में वो यही करता है। और अगर थोड़ी फुरसत हो तो देखिएगा उसके चेहरे पर वो मंद-मंद मुस्कान जो सहसा छलक आती है जब भी वो लड़की किताब से अपना चेहरा उठाती है। इसी लड़के के बगल में एक लड़की बैठी है जो कल रात अपनी सहेलियों के साथ बैठ कर लगायी गयी अपनी नेल पोलिश को निहार कर मुस्करा रही है। कल रात की बातों को ध्यान कर के वो खुश तो बहुत हो रही है पर कुछ ही दिनों में दोस्तों से बिछड़ने का ग़म भी उससे सता रहा है, इसी लिए शायद खुल के नहीं हँस पा रही है। 

कक्षा के बीचों बीच बैठे साहबज़ादे अपनी कलम को कागज़ पर कुछ इस तरह रफ़्तार दे रहे हैं जैसे गीली उंगलियों को झटक कर पानी छिड़क रहे हों। ग़ौर से देखा तो मालूम पड़ा के कलम से स्केच खींचा जा रहा था, एक वादी का जिस पर अभी अभी सूरज उदय हो रहा था। इन से थोड़ा ही आगे एक सज्जन बैठे हैं, बाल खुजलाते हुए भौतिकी की ना जाने कौन सी गुत्थी में खोये हुए हैं। इन दोनों से एक कतार ऊपर एक लड़का है खादी के कुर्ते में थोड़ा विचलित सा, उसकी कहानी पर गौर फरमाएं तो पता लगेगा के वो जिस मेस वर्कर को पढ़ाने जाता है आज उसका नतीजा आ गया और वो २ अंक से परीक्षा में फेल हो गया। 

आइये कक्षा के इस कोने में आयें। एक उदास सा, मुरझाया सा, गुडी-मुड़ी कमीज़ पहने जो लड़का सामने बैठा है वो आम तौर पर काफी खिलखिलाया करता है पर आज न जाने किस घटना ने उसे ऐसा कर दिया है। खोज-बीन से मालूम हुआ के उसके पिताजी की तबीयत अचानक ख़राब हो गई है और वो २ दिन बाद शुरू होने वाली परीक्षा की वजह से उन तक नहीं पहुँच पा रहा है। आइये सामने बैठी इन मोहतरमा को देखें। बहुत कुछ लिख रही है ये, पर एक क्षण गौर तो कीजिये, यह क्या, यह तो एक स्पीच लिख रही हैं रोमियो और जूलिएट की और बीच-बीच में नज़रें चुरा कर कक्षा की दूसरी ओर भी देख रही हैं। अब समझ में आया, वो उलझे बाल वाला लड़का है इस स्पीच का रोमियो।

देखा आपने कैसे हम लोग 'लॉजिक' की इस दुनिया में खो कर सिर्फ 1 और 0 ही देख पाते हैं। ना दो धड़कते दिल एक दुसरे को सुन पाते हैं न ही कोई उस उभरते कलाकार को सराहता हैं, ना ही उस खादी के पीछे छुपी निराशा हटाने का कोई प्रयास करता है और अचंभित करने वाली बात तो ये है के बगल में बैठे हुए मित्र न सही, सहपाठी की जीवन की इतनी बड़ी विपदा पर हम और आप ग़ौर तक नहीं फरमाते।

बड़ी ही रंगीन दुनिया सजी है यहाँ। आँखें चौंधिया देने वाली चमक है इसमें, इन रंगों में डूबे हुए मेरी तो बस एक ही तमन्ना है के काश कोई मेरी ही तरह इस वक़्त मेरी इस दुनिया में गोते लगा रहा हो। 

Tuesday, 2 April 2013

Why do we have shadows ?


A trivial question which anyone with rudimentary knowledge of optics can answer. A shadow is an area where direct light from a light source cannot reach due to obstruction by an object.

Ironically many consider it as their soul mate. A soul mate who is absent in the darkest of hours. A soul mate which continuously keeps morphing while one moves from one light source to another on the road of life. And in the most timorous manner hides under one's feet when the scorching sun unleashes it's terror. 

It owes it's genesis to an obstruction. A massive collision between lightening fast
photons and the object. Try and grasp the fact that this progeny of conflict follows us almost everywhere.

Looking at the positive side, it is this shadow which caresses away the burning heat when under a tree during summers. Interestingly something which has no existence of it's own has the power to modulate temperature. Ponder over the previous thought with your physics caps off. It is baffling to absorb the fact that something so insignificant can have such a profound effect on it's surroundings. 

On an astronomical scale the shadow of the moon on the sun or that of the earth on the moon results into some spectacular scenes with some interesting astrological consequences. 

But the question still remains unanswered. It looked pretty bagatelle when I began but the more I think the more convoluted this appears to me. Probably you should also give it a try. Why do we have shadows ?

Saturday, 30 March 2013

कहूँ किससे मैं के क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है


वो पहली मुलाक़ात की उसकी हँसी मुझे आज भी याद है। वो रुक्सार पर छाई लालिमा आज भी मदहोश कर देती है मुझे। उसके मासूम स्पर्श से तो कलियाँ तक झूम उठी थीं, चिड़ियाँ चहचहा कर दूर गगन में जा उड़ी थीं। उसका साथ मेरे रोये रोये को प्रफुल्लित कर देता था। सोचा था के उसके तेज में मेरी खामिया छुप जाएगी। उसका हाथ थाम लिया तो बड़ी सी बड़ी विपदा भी मेरे रास्ते से हट जायेगी।

कुछ समय तक तो बिलकुल ऐसा ही हुआ। पर जैसे जैसे वक़्त बीता उसका मिजाज़ बदलने लगा। समय के साथ साथ उसका तेज आक्रोश में बदलने लगा। उसकी कोमलता क्रूरता में बदलने लगी। वही कालियाँ जिन्हें कभी उसने प्रेम से सहलाया था आज उन्ही को वो ध्वस्त करने पर आमादा था। जहाँ भी जाता था लोगो को ठेस पहुँचा कर ही आता था। प्रेम के बादल छटते हुए प्रतीत होने लगे थे। मेरी मदहोशी अब गुम सी होने लगी थी। अब बात मेरी बरदाश्त के बाहार होने लगी।
मैंने आवेश में आ कर उसे खरी खोटी सुना दी। शायद कुछ ज़्यादा ही आक्रोशित था मैं। उसने कुछ देर तो क्रोध दिखाया पर फिर सहसा शांत हो गया। शायद उसे यह विश्वास ही नहीं हो रहा था के मैंने उसे बुरा भला कहा था।

मेरा क्रोध तो अभी भी शांत ना हो पाया था पर उसका तेज न जाने कहा खो गया। उसका अस्तित्व ही कहीं गुम हो गया। अपने आवेश में मैं यह सब देख ही नहीं पाया था। उसका साथ मुझे अब एक गलती प्रतीत होता था। कोप में मैं अँधा सा हो गया था।

पर सहसा उसे यूँ मुड़ कर जाते देखा मेरा अहंकार चकना चूर हो गया। एक अजीब सी टीस उठी मेरे दिल में। उसे जाते देखना नश्तर की तरह चुभ रहा था मुझे। अहम् की बेड़ियाँ तोड़ते हुए मैंने उसे रोकने की हर मुमकिन कोशिश की। हर ईश्वर से प्रार्थना की पर वो न रुका। जल समाधी ले ली उसने। उस नदी में। लाचार सा मैं बस देखता रहा। अन्दर ही अन्दर कुढ़ता रहा। डूब गया मेरा 'सूरज'|  

कुछ नहीं बचा है अब, ना वो ऊष्मा ना वो लालिमा और ना ही चिड़ियाँ हैं अब आसमान में जो कि इस आँधी में बिखरे हुए हुए मन में तिनकों को फिर से जोड़ दे। हर तरफ अँधेरा हैं। बैठा हूँ मैं इस अन्धकार में न केवल अपना बल्कि अपने साये तक का वजूद खॊये हुए। एक उजड़ा हुआ मन बचा हैं और साथी के नाम पर उम्र भर की तन्हाई है। यह सन्नाटे की गूंज बहरा कर रही है मुझे। लौट आओ ऐ 'आफताब' बचा लो मुझे इस दम घोटती रात से।

Wednesday, 13 March 2013

किताब-ए-माज़ी के औराक उलट के देख ज़रा


आज एक अरसे बाद कक्षा ७ की हिंदी की पुस्तक देखी। रंगों की भरमार थी उसमें। अगर आपने कभी होली के दिन सड़क पर गौर किया हो तो कुछ वैसी ही रंग बिरंगी थी वो। 

पेंसिल की वो टेढ़ी-मेढ़ी लकीरे, वो चित्रों में पुरुषों की कलम से खींची गयी मूंछे, वो हर व्यक्ति के चेहरे पर ऐनक, अचानक ही यादों का एक सैलाब ले आया। 


अब कॉलेज में बस किताबें मोटी होती जा रही है और फॉण्ट छोटे। चित्रों के नाम पर तो बस कुछ अजीब से आकार ही बचे हैं वोह भी 90* के कोड़ पर तैनात २ रेखाओं  के बीच फंसे हुए अपना दम तोड़ रहे हैं। अगर बचपन में इन्हें देखा होता तो क्या ठहाके लगा कर हँसे होते। sine वक्र रोलर कोस्टर लगता और tan फिसलने वाला झूला। पर आज तो इन्हें देख कर सिर्फ इनका integration या differentiation ही नज़र आता हैं। और ऐसा हो भी क्यों ना कल्पना की उड़ान खत्म करने में पुरे 2 दशक लगाये हैं हमने। 

12 साल ABCD पढ़ने का क्या फायदा हुआ जब आज सारी किताबे αβγθ से लत-पथ हैं। 

ख़ैर जाने दीजिये, जाइये डूब जाइये उन मोटी पोथियों में। आखिर पेट तो इन्ही को घोटने से भरेगा। पर जाते जाते ये विचार अपने साथ ले जाइये, क्या याद नहीं आती आपको वो 'काबुलीवाला' की कहानी, वो दुनिया भर का ज्ञान समेटे कबीर और रहीम के दोहे?