किराये का खेत, क़र्ज़ के बीज और खाद, सूतकर का सूत, बैंक का नोटिस, बेटी की शादी और तबाह हुई फ़सल। जैसे ये कम न था के अब मृत किसान की चिता। कुछ ज़्यादा ही खर्चे हैं इस देश के 60% परिवारों के।
एक भाव शून्यता सी मालूम पड़ती है इस देश में। एक किसान आप से कुछ गज़ दूर भरी महफिल में पेड़ से लटक कर अपनी जान दे देता है और आप महानुभाव मंच पर भाषणबाज़ी में ही मगरूर रह जाते हैं। और आप ही क्या, कैमरे में लाइव आत्महत्या कैद करने का रोमांच ही अलग है जो पत्रकार टस से मस नहीं होते हैं। पुलिस को तो अब कुछ कहने का मन भी नहीं करता।
किसानों के मरने से इस देश को कुछ ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता रहा है क्योंकि पिछले 10 वर्षों में 3 लाख से भी ज़्यादा किसानों ने आत्महत्या की है। पर इस घटना का राजनैतिक रास कुछ इस कदर स्वादिष्ट है कि विदेश में देश पर चिंतन कर लौटे हमारे राज कुमार अस्पताल पहुंचे और क्योंकि इस देश का हर किसान मुझसे भी ज़्यादा ट्विटर पर वक़्त बिताता है, आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने ट्विटर पर अपना शोक व्यक्त किया।
हर रोज़ संसद में और समाचार चैनलों पर भिन्न-भिन्न राजनीतिक पार्टियाँ एक-दूसरे पर किसान-विरोधी होने की छींटाकशी कर रहीं हैं और साथ ही में यह भी जता रही हैं कि उनसे ज़्यादा किसानों का हितैषी कोई दूजा नहीं। आप रोज़ सुनते होंगे कि सरकार से मुआवज़े की मांग भी हो रही है। मगर एक अनोखी बात बताऊँ आपको, क्या आपने इस लेख के पहले वाक्य पर ध्यान दिया? अगर हाँ तो यह जान लीजिये कि इस मुआवज़े के मिल जाने से भी कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ेगा इस देश के किसानों पर। अधिक्तर किसान किसी और की ज़मीन पर खेती करते हैं और सरकारी नियम के मुताबिक मुआवज़ा खेत के मालिक को ही दिया जा सकता है और ऐसा इस लिए क्योंकि सरकार के अनुसार जमींदारी के खात्मे के बाद बटाई पर खेती मुमकिन ही नहीं है।
कभी आपने सोचा कि हमारे अन्नदाता को राष्ट्रीय नीति निर्माण करते वक़्त नज़र अंदाज़ क्यों कर दिया जाता है? क्यों ऐसा होता है कि श्रीमान विजय माल्या को करोड़ों रुपये का ऋण माफ़ हो जाता है और एक गरीब किसान को चंद हज़ार रुपये के लिए अपनी जान देनी पड़ती है ? शायद ऐसा इस लिए क्योंकि इस देश की 60% (किसान) से भी ज़्यादा आबादी सकल घरेलू उत्पादन (GDP) में मात्र 14% का योगदान देती है जबकि मुझ जैसे लोग और शायद आप भी जो की किसी विदेशी कंपनी को अरबों $ का मुनाफा पहुँचाते हैं, वे इसमें लगभग 65% का योगदान देते हैं। आज के युग में एक देश की सफ़लता का पैमाना यही सकल घरेलु उत्पाद है लिहाज़ा ऐसा हो भी क्यों ना।
इसका एक कारण और भी है और वो कारण हम और आप है। आप सोच रहे होंगे के आप कैसे? आपने तो कभी किसी किसान को आत्महत्या पर मजबूर नहीं किया। न ही आप मदर इंडिया के सुखीलाला हैं जिसने सूत ले ले कर गरीबों की आर्थिक स्थिति चरमरा दी हो। यह सब न करने के बावजूद भी आप ज़िम्मेदार हैं। यह तो आज अगर हमारे शहरों में आकर, बीच मैदान में यह खेतिहर न लटकने लगते तो हमारे लिए आज भी IPL में चेन्नई की जीत ज़्यादा महत्वपूर्ण होती। जैसे 3 लाख मर गए है वैसे ही 3 लाख 10 हज़ार सही। चैनल पलटते वक़्त 2 मिनट देख लिया, इतना बहुत है।
जबतक हम किसी सरकार और राजनीतिक पार्टियों को इस भयावह स्थिति का दंड नहीं देंगे ये हालात ऐसे ही रहेंगे। जब तक मेरे और आपके लिए सबका साथ सबका विकास मात्र एक 2 अंक की संख्या है (GDP) तब तक गरीब किसानोँ के बच्चे यूँ ही यतीम होते रहेंगे। इस देश के विकास का ठेका ज़रूर कुछ चंद लोगों के पास है पर वह विकास कैसा होगा, उसके मूल्य क्या होंगे, उससे आप और आपके देशवासी कैसे प्रभावित होंगे इसकी नैतिक ज़िम्मेदारी उन ठेकेदारों से कहीं ज़्यादा आपकी है। एक बात ज़रूर याद रखें- प्रजातंत्र का ड्रामा तब तक ही सुरक्षित रहता है जब तक संपन्न और विपन्न के बीच का फ़र्क एक सीमा के अंदर बना रहता है।