Sunday, 5 May 2013

कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है।


सपने, आशाएँ, चाहतें , इच्छाएं, ये वो शब्द हैं जो अक्सर ऐसी घटनाओं को परिभाषित करते हैं जिनका घटना मुश्किल या फिर नामुमकिन होता है। भगवान बुद्ध सिखा गए के इच्छा ही सब दुखों का कारण है। पर यह पूर्ण सत्य नहीं है। जो उल्लास इन सपनों को बुनने में है उसे क्यों नज़रंदाज़ किया जाता है। 

हर कामना के पीछे का भाव एक ऐसी अनुभूति होती है जिसे पहले महसूस न किया गया हो। स्वप्न लोक में उस अनुभूति का सुख शायद पृथ्वी लोक से कई गुना बेहतर होता है। और ऐसा हो भी क्यों ना, आखिर स्वप्न लो
क की हर घटना पर आप का नियंत्रण होता है। हर भावना ठीक वैसे ही व्यक्त होती है जैसा आप उसे महसूस करना चाहते हैं।

पर आप सोच रहे होंगे के यह कैसे हो सकता है, "अगर हर स्वप्न के पीछे का मूल भाव एक ऐसा अनुभव है जो मुझे पहले हुआ ही नहीं, फिर मैं कैसे उसे महसूस कर सकता हूँ, या उसे कैसे नियंत्रित कर सकता हूँ?" इस प्रश्न का उत्तर है आपके जीवन की संचित अनुभवों में या उनके सुने और पढ़े गए वर्णन में। मसलन, अगर आपने शराब कभी न पी हो फिर भी आप उसकी मैकशी का अंदाज़ा लोगों के वर्णन से लगा सकते है। 

इच्छा खुद में कभी निराश नहीं करती। किसी भी इच्छा का जन्म या फिर उसकी पूर्ती की कल्पना बेहद हर्षित करती है। घंटों खयाली पुलाव पकाने में जो आनंद है वह शायद उस सपने के सच हो जाने में नहीं। रोज़ मर्रा के जीवन से हट कर इस खयाली दुनिया में खो जाना बेहद सुकून देने वाला होता है। अगर हर कामना सच होने लगे तब फिर यह खयाली दुनिया का अस्तित्व ही ख़त्म हो जायेगा। इस जिंदगी की जीवंतता ही मिट जाएगी। 

आशा करता हूँ यह पढ़ते हुए आप भी ऐसी ही अपनी किसी कामना के बारे में सोच रहे होंगे। अपने विचार उसकी पूर्ति पर ना केन्द्रित कीजिये, बस चंद लम्हे अपनी इस आशा के साथ बिताइये। उन खयाली महलों में खो कर आनंद का अनुभव कीजिये। मुझे विश्वास है के अब तक आपके चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान ज़रूर छलक आई होगी।  

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