Friday, 25 August 2017

आज़ादी का long weekend

"वाराणसी से चल कर प्रतापगढ़, रायबरेली, लखनऊ, मुरादाबाद के रस्ते दिल्ली को जाने वाली गाड़ी संख्या चौदह हज़ार दो सौ सत्तावन काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस प्लेटफार्म नंबर छः पर आ रही है", सुनकर अपने अध्भीगे रुमाल से पसीना पोंछते हुए फिरदौस ने ख़ुद को आगे आने वाले लम्बे सफर के लिए बेमन से तैयार किया। 

यह कहना तो गलत होगा किआज़ादी की सत्तरवी वर्ष गाँठ मानाने के लिए वह घर आया था। सच तो यह है कि १५ अगस्त के 'long weekend' में कोई और योजना ना बन पाने के कारण लखनऊ आ गया था। लखनऊ तक के सफर का उसका आंकलन औसत था। गुडगाँव से वातानुकूलित टैक्सी से दिल्ली, वहां से 'duplicate' लखनऊ मेल के AC ३ टियर से चारबाग़ और फिर एक वातानुकूलित टैक्सी से घर। घर तक के रास्ते में वो सोच रहा था, "यह ट्रेन का सफर अब दिन पर दिन कठिन होता जा रहा है, न ठीक से बर्थ पर अटता हूँ,  ऊपर से कमर भी दुःख जाती है। इस बार वापसी में पिताजी को बोलूंगा कि गाड़ी दे दें", सोचते हुए फिरदौस के मन में उत्साह की लैहर दौड़ गयी। गाड़ी के ख्याल ने कुछ और भी पुलाओ पकाया, मानो अब तो गुडगाँव की सड़कों का बेताज बादशाह बन बैठा हो। कल्पना की उड़ान तो यहाँ तक पहुंच गयी कि वापसी में स्वर्ण शताब्दी का टिकट तत्काल में कराने को उसने वैकल्पिक योजना ठैहरा दिया। 

झिझक और डर से भरे होकर भी उसने पिताजी के सामने अपनी माँ से चार पहिये की बात छेड़ दी। माँ ने तमतमाते हुए फिरदौस की अर्ज़ी ख़ारिज कर दी, पिताजी की कोई भी प्रतिक्रिया न आने पर फिरदौस उनका भी जवाब समझ गया। १४ अगस्त को सुबह १०:०० बजे शताब्दी का तत्काल टिकट करने का उसका प्रयास भी असफ़ल रहा। टिकट कराने की असफलता फिरदौस की गाड़ी प्राप्ति की अंतिम उम्मीद बन कर उसके मन को प्रफुल्लित कर गयी। इशारों-इशारों में उसने पिताजी से फिर गुहार लगायी पर उन्होंने अनसुना कर दिया। इस दिलेर कारनामे के चलते फिरदौस के पास अब गाड़ी तो छोड़िये, AC ट्रेन का टिकट भी न था। खाया पिया कुछ नहीं गिलास थोड़ा बारा आना उसे अपनी अवस्था पे चरितार्थ होता मालूम पड़ रहा था! हथियार डाल कर अब उसने ११:०० बजे 'sleeper' में टिकट कराने का फैसला किया। ऊपर वाले की अनुकम्पा से उसे आख़िर कशीविश्वनाथ में टिकट मिल गया। 

चारबाग़ स्टेशन पर ट्रेन आने का सन्देश हो चुका था। आज लखनऊ में ऊमस अपने चरम पर थी। पसीना था के रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। बहुत दिनों के बाद स्लीपर में चलने की कुछ खीज भी थी फिरदौस के मन में। कहाँ AC ३ को कष्टकारी समझने वाला कहाँ अब 'sleeper' में सफर करने जा रहा था। अनारक्षित डिब्बे के ठीक बगल में होने के कारण उसके डिब्बे में भी काफी भीड़ थी। दरवाज़े से करीब ४ लोग लटक रहे थे और किसी तरह उनको पार कर के अपनी बर्थ तक पहुंचने में ६-८ लोगों को और धक्का मारना पड़ा। उसकी बर्थ कोच में पहली थी। इस वजह से वहाँ लोगों की सँख्या और भी ज़्यादा थी। वहाँ पहुंचने पर बिना आरक्षण वाले यात्रियों को अपनी सीट से हटाना पड़ा। अपनी भाव भंगिमा से अपनी विरूचि प्रदर्शित करने में उन लोगों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। शीघ्र ही ट्रेन चल दी और वह अपनी ऊपर वाली बर्थ पर चढ़ गया। 




अपनी सम्पत्ति की सुरक्षा सर्वोपरि थी इस लिए उसने जूते पहन कर ही ऊपर चढ़ना श्रेष्ठ समझा। उमस का असर यहाँ भी बरक़रार था। कुछ देर किताब पढ़ी फिर झपकी आ गयी। रात करीब १२ बजे जब नींद खुली और प्रसाधन जाने का विचार किया तो पाया कि डब्बे में सब सो गए थे। उसकी तरफ की सबसे नीचे वाली बर्थ पर २ महिलायें सो रही थीं, उनके सामने वाली बर्थ पर एक सज्जन सो रहे थे और एक जनाब किसी तरह खुद को अकड़ू बर्थ के एक छोर पर फँसे हुए थे। ज़मीन पर चादर डाले एक लड़की सो रही थी। साइड बर्थ पर तो गज़ब ही दृश्य था, कुल ४ लोग लाशों की भांति एक-दूसरे पर पड़े थे, उनके ऊपर वाली बर्थ पर भी २ लोग और कुछ ४ बस्ते विराजमान थे। नीचे उतरते ही उसकी नज़र २ लड़कों पर पड़ी जो दरवाज़ा खोले पैर बाहर लटका कर ज़मीन पर बैठे थे। दोनों ही नींद की गिरफ़्त में थे और न जाने कैसे खुद को बाहर गिरने से रोक रहे थे। थोड़ा बढ़ने पर उसने पाया के कम्पार्टमेंट से निकलते ही एक महिला अपने बच्चे को लिए फर्श पे सो रही थी, उससे सटा हुआ कोच का कूड़ा दान था। उसके साथ ही दूसरे दरवाज़े तक शायद ५ लोग और थे। वह भी कुछ इसी अवस्था में थे। दोनों प्रसाधन के बीच की जगह में भी दो लोग काफ़ी चैन की नींद सो रहे थे। 

इन सबको लांघते हुए फिरदौस किसी तरह प्रसाधन कक्ष पंहुचा जो की बुरी तरह महक रहा था। वहाँ से लौटते वक़्त उसे ये अहसास हुआ कि सारे लोग जिन्हे उसने अभी २ बार लांघा वे न ही उसके कूच से विचलित हुए और न ही प्रसाधन की तीक्ष्ण दुर्गन्ध से। अपनी बर्थ पर वापस आ कर इस अनुभव के बारे में सोचने लगा। खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहा था। इन लोगों की व्यथा के आगे अपनी असुविधाओं की तुच्छता पर लाज आ रही थी उसे। "कहाँ मेरे लिए AC कोच न मिलना समस्या थी और दरवाज़े से लटके वह दोनों लड़के रात की ठंडी हवा में चैन से सो रहे हैं, कहाँ मुझे प्रसाधन की तीव्र दुर्गंद नाग़वार थी और कहाँ वो माँ है जो कूड़े दान के आगे भी अपनी संतान को अपनी छाती से लगाये थपकी देकर सुला रही है", उसने सोचा। जहाँ उसके मन में अकेले लखनऊ से दिल्ली अपनी चार पहिया गाड़ी से न जा पाने का ग़म था वहीँ  ४ लोगों का परिवार वाराणसी से दिल्ली तक का सफर एक बर्थ पर काट कर संतुष्ट था। ट्रेन के धक्कों से जहाँ एक तरफ उसका शरीर हिचकोले खा रहा था वहीं इन विचारों के तूफ़ान में उसका अन्तःकरण डूबता जा रहा था।

उसे पिछले ७० वर्षों में हुई प्रगति पर संशय हो रहा था। क्या हासिल हुआ आज़ादी, जनतंत्र, संविधान, सकल घरेलु उत्पाद (GDP) से उन लोगों को जो शौचालय के सामने लेटे हुए थे? अच्छे दिनों का सपना उसे अपनी आँखों के सामने दम तोड़ता हुआ नज़र आ रहा था। क्या यही नेहरू जी के 'tryst with destiny' का प्रतिबिम्ब था? निराशा के अन्धकार में उसका मन डूबने लगा। अपने कष्टों और सहयात्रियों की विषमताएं देख कर उसे भारत और इंडिया का अन्तः भेद महसूस हो रहा था।  

वह उठ कर बैठा और दरवाज़े पर लटके दोनों युवकों को देखने लगा। गाँधीजी के शब्द उसके मन में तैर रहे थे - 'there is enough on Earth for everybody's need, but not enough for everybody's greed' . उसने बर्थ पर अपना सामान एक तरफ समेटते हुए दोनों लड़कों को पुकारा, "ऊपर आ जाओ, ये बर्थ आधी ख़ाली है"। यह कह के फिरदौस गुड़िया के लेट गया। कब वह नींद में खो गया, पता ही नहीं चला। सुबह जब गाज़ियाबाद स्टेशन पर आँख खुली तो उसने देखा के उसके सामने एक लड़का दीवार की टेक लगाए और सामने वाली बर्थ प पाओं फसाये सो रहा है। ज़रा ध्यान से देखा तो एहसास हुआ कि यह वही लड़का है जो कल रात दरवाज़े से लटक रहा था। फिरदौस के चेहरे पर सहसा एक मुस्कान खेल गयी, और वो करवट बदल के दोबारा सो गया। 

Sunday, 23 April 2017

भाव शून्यता

मेरे मोबाइल पर गूगल न्यूज़ का नोटिफिकेशन आया, लिखा था "Tamil farmers drink urine on the 40th day of protest at Jantar Mantar"। यह सुर्खी पढ़ के सच कहूँ तो पहले घिन सी आयी, सोचा कोई ऐसा क्यों करेगा? थोड़ा और पढ़ा तो याद आया यह वही लोग हैं जो कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री कार्यालय के सामने नग्न हो गये थे। थोड़ी और रूचि बढ़ी तो सोचा इस खबर का वीडियो देख के पूरा मसला समझ लिया जाये। 



गूगल पर आसानी से कुछ नहीं मिला तो सोचा रवीश जी ने ज़रूर कुछ ख़बर चलायी होगी इस पर। २ प्राइम टाइम वीडियो मिले - एक अभी कल ही का था। इस वीडियो में किसानों द्वारा ४० दिन में हर दिन अपनाये गए प्रदर्शन के असाधारण तरीकों का वर्णन था। गले में मरे हुए किसानो के कंकाल की माला पहनना, दिल्ली रेलवे स्टेशन से चूहे उठाकर उन्हें मुँह में दबाना, सकड़ पे चावल बिछा के खाना, नग्न हो जाने से लेकर मूत्र पी लेने तक सब शामिल था। 

तमिल नाडु में इस बार सूखे ने पिछले १४० वर्षों का कीर्तिमान तोड़ दिया और कर्नाटक द्वारा कावेरी नदी का पानी ना छोड़े जाने से किसानों की हालात पूरी तरह चरमरा गयी। अक्टूबर से दिसंबर के बीच में १४४ किसानों ने क़र्ज़ के बोझ तले आत्महत्या कर ली। वहाँ के सत्ता हथियाने के अश्लील खेल से हताश होकर ये किसान दिल्ली आ गये। २५ वर्ष से लेकर ७५ वर्ष तक के पुरुष तथा महिलायें इस प्रदर्शन में शामिल हैं। दिल्ली की कठोर गर्मीं में कुछ किसान बीमार हो के तमिल नाडु वापस लौट गए और उनकी जगह कुछ और किसान आ गए। पिछले ४०दिनों से यह लोग जंतर मंतर पर शांति पूर्ण प्रदर्शन कर रहें हैं। कई नेताओं ने जंतर मंतर पर अपनी हाज़री भी दर्ज कराई पर अभी तक केंद्र सरकार की ओर से इन्हें कोई भी राहत नहीं पहुंचाई गयी है।



जब तक मैंने यह वीडियो देखा, मन में एक टीस उठती रही, मेरा अस्तित्व इन तमिल किसानों की व्यथा देख कर मुझे कचोटता रहा। इन किसानों की पीड़ा देख कर लगा कोई कैसे ये सब होता देख कर चैन से सो सकता है। इस दौरान एक क्षण को जंतर मंतर जाने का फैसला भी कर लिया। फिर वीडियो ख़त्म हुआ और मैं रात्री भोज को चला गया। खाने में लज़ीज़ व्यंजन खाये, ठंडा पानी पिया और अपने वातानुकूलित कमरे में आकर अपने मुलायम गद्दे पर पसर गया। संवेदनहीनता की पराकाष्ठा को मैंने आज बहुत करीब से महसूस किया। प्रतीत होता है के मेरे अंदर की मानवता शायद कहीं दूर दुबक कर चैन की नींद सो गयी है। हाँ! एक संतोष अवश्य है, इस भाव शून्यता के शिखर पर मुझे अकेलापन नहीं महसूस हो रहा है क्योंकि आप, मीडिया और भारत सरकार भी मेरे साथ यहीं हैं।

मीडिया अपने-अपने राजनैतिक मालिकों की गुलामी में, या फ़िर आईपीएल में व्यस्त है। आप या तो अपने में ही मसरूफ़ हैं या फिर अपने इष्ट नेता के दैवीय कारनामों से विशि भूत हैं। पर सरकार का इस चोटी पर होना कुछ समझ नहीं आया। चलिए हम और आप इनके नहीं पर यह सरकार तो इनकी है, सरकारी हुक्मरान तो इन लोगों का उद्धार करने के लिए ही बैठे हैं। अच्छा ! २०१९ के चुनावों में अभी वक़्त है और केंद्र की सत्ताधारी पार्टी का तमिल नाडु में कुछ ख़ास वोट बैंक नहीं है।


चलिये जाने दीजिये ! सुना है के कल शायद यह किसान अपना मल खायेंगे, समय मिला तो एक नज़र इस ख़बर को देख लीजियेगा वरना कल आईपीएल देख कर 'कोरबो लोड़बो जीतबो रे' गा लीजियेगा। वैसे भी खेती के दौरान आत्माहत्या तो अब व्यवसायजनित जोखिम है। 

जय हिन्द ! जय श्री राम !

Sunday, 28 February 2016

हंगामा है क्यों बरपा


"पाकिस्तान ज़िंदाबाद, भारत मुर्दाबाद", "कश्मीर मांगे आज़ादी, छीन के लेंगे आज़ादी" इत्यादि नारों ने एकाएक भारत के जन मानस के अंदर राष्ट्रवाद की एक लहर पैदा कर दी है। तमाम अवाम आज JNU में लगे इन नारों पर रोषित है और तत्काल प्रभाव से न केवल JNU को बंद देखना चाहती है बल्कि नारेबाज़ी करने वालों को कठोर से कठोर सज़ा भी दिलाना चाहती है। दिल्ली में कई ऑटो वाले तो JNU के छात्रों को पाकिस्तान उतारने की तीव्र इच्छा से ग्रसित हैं। कई टीवी चैनलों ने इस नारेबाज़ी के सानिध्य में देश के लिए जान की क़ुरबानी देने वाले सिपाहियों को ला खड़ा किया। यह दृश्य इस हद्द तक खींचा गया के एक थल सेना के सेवानिवृत सेनापति एक टीवी बहस के दौरान फूट फूट कर रो पड़े। इस प्रतिबिम्ब ने आम भारतीय के अंदर लगी राष्ट्रवाद की चिंगारी को लपट में तब्दील कर दिया। राष्ट्रवाद की यह लपट इस क़दर जन समान्य के अंतर्मन में फैली कि बहुत से लोगों ने न्यायालय के अंदर आरोपियों के साथ मार पीट को सही ठहराया । हाथ में भारत का झंडा लिए वकीलों का मीडिया कर्मीयों पर हमला न केवल जायज़ बल्कि देश भक्ति का उदाहरण करार दिया गया।



यह कैसा एक तरफ़ा आक्रोश है जो तब नहीं उठा जब पांच हज़ार से ज़्यादा गरीब किसान आत्मा हत्या कर रहे थे (कर रहे हैं) या तब कहाँ चला जाता है जब भारत विश्व के कुछ सबसे भूखे देशों में से एक साबित होता है या फिर तब क्या होता है इस राष्ट्रवाद की अग्नि का जब देश में एक साल में चौबीस हज़ार से अधिक महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं सामने आती हैं। आपके अंदर का यह कैसा राष्ट्रवाद है जो तब नहीं रोषित होता जब एक दलित मज़दूर आपके घर के सामने के नाले में अर्ध नग्न उतर कर आपका मल मूत्र अपने सर पर ढोकर साफ़ करता है।  यह कैसा राष्ट्रवादी खून है जो तब नहीं खौलता जब चुनाव जीतने के लिए दंगे कराये जाते हैं या फिर आरक्षण की माँग के लिए गरीबों की दुकाने जला दी जाती हैं?


राष्ट्रवादी विचारधारा की मूल समस्या यही है के इसके लिए राष्ट्र सर्वोपरि है। इस कारण उसमें किसी भी खामी की गुंजाइश ही नहीं है। और हर वक़्त देश को विश्व का सबसे महान देश बताने की एक होड़ सी है। इसके कारण एक राष्ट्रवादी को देश की सिर्फ अच्छाई दिखती है उसकी कमियां नहीं।शायद इसी लिए राष्ट्रवादी लोगों को इन नारों से देश की प्रभुता पर खतरा मंडराता नज़र आ रहा है और बढ़ती आर्थिक असमानता से नहीं। यह अचंभे की बात नहीं के भारत का राष्ट्रगान लिखने वाले रबिन्द्रनाथ टैगोर राष्ट्रवाद को देश के लिए खतरा बता गए थे।

सामन्य जनता को देशभक्त के नाम पर राष्ट्रवादी बनाने की एक मुहीम सी है। देशभक्त सिर्फ वह ही नहीं जो देश के लिए अपनी जान दे, देशभक्त वह भी है जो अपने स्तर पर देश की अंतर्निहित समस्याओं को स्वीकार कर के उनके निवारण की चेष्टा करता है। देश भक्त वह है जो गाँधीजी की अहिंसा एवं सौहार्द की शिक्षा का पालन करता है। जो देशवासियों को धर्म, लिंग, जाति अथवा आर्थिक श्रेणी के ऐनक से न देखे।



बहुत से सुशिक्षित, सुलझी विचार धारा के लोग भी राष्ट्रवाद की गोली खा कर अपने खून का दबाव बढ़ाये घूम रहे हैं। सोशल मीडिया पर अचानक देश के रक्षक बन बैठे हैं। कुछ ने अपने आप को न्यायपालिका मान कर लोगों को राष्ट्रवादी और वामपंथी (पिछले कुछ समय में इस शब्द का प्रयोग राष्ट्रद्रोही के पर्याय के तौर पर किया जा रहा है) होने का प्रमाणपत्र बाँटना शुरू कर दिया है। मेरा मानना है कि देश में तत्काल प्रभाव से दो नई संवैधानिक संस्थायें स्थापित करनी चाहिए। यह दोनों संस्थाएँ नागरिकों का वर्गीकरण करें। एक नागरिकों को राष्ट्रवादी / राष्ट्र द्रोही प्रमाणित करे और दूसरी साम्प्रदायक / धर्म निरपेक्ष प्रमाणित करे। इससे आम आदमी का काफी वक़्त बचेगा और तब शायद उसका ध्यान कुछ छुट्ट्कर ख़बरों की तरफ भी जाये। हो सकता है तब यह अनुभूति हो कि जहाँ एक तरफ डॉलर और महंगा हो गया वहीँ सड़क पर सो रहे मज़दूर की ज़िन्दगी कुछ और सस्ती। या शायद तब याद आएगा के माल्या साहब उसकी जेब से हज़ारों करोड़ ले कर चलते बने हैं। और कुछ नहीं तो ऊपर वाले की तरफ़ देख कर 80C के तहत छूट बढ़ने की एक प्रार्थना का वक़्त तो अवश्य ही मिलेगा।

आईये इस राष्ट्रवाद की मादकता से ख़ुद को मुक्त करें और देशभक्त बने। देश के संविधान और उसके सिद्धांतो की रक्षा करें। दूसरों के विचारों को सुनने का साहस रखें और अपने विचारों को बिना उत्तेजित हुए कहें। इस बात पर गर्व करें कि आप एक ऐसे देश में हैं जहाँ आपको अपने विचार प्रकट करने की आज़ादी है पर यह ज़रूर ध्यान रखें कि यह आज़ादी पूर्ण नहीं कर्तव्यबद्ध है। और हाँ कृपया देशवासियों को व्यर्थ में पाकिस्तान न भेजें।   

Thursday, 23 April 2015

जय जवान जय किसान - एक मिथ्या

किराये का खेत, क़र्ज़ के बीज और खाद, सूतकर का सूत, बैंक का नोटिस, बेटी की शादी और तबाह हुई फ़सल।  जैसे ये कम  था के अब मृत किसान की चिता।  कुछ ज़्यादा ही खर्चे हैं इस देश के 60% परिवारों के।  

एक भाव शून्यता सी मालूम पड़ती है इस देश में। एक किसान आप से कुछ गज़ दूर भरी महफिल में पेड़ से लटक कर अपनी जान दे देता है और आप महानुभाव मंच पर भाषणबाज़ी में ही मगरूर रह जाते हैं। और आप ही क्या, कैमरे में लाइव आत्महत्या कैद करने का रोमांच ही अलग है जो पत्रकार टस से मस नहीं होते हैं।  पुलिस को तो अब कुछ कहने का मन भी नहीं करता। 

किसानों के मरने से इस देश को कुछ ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता रहा है क्योंकि  पिछले 10 वर्षों  मेंलाख से भी ज़्यादा किसानों ने आत्महत्या की है।  पर इस घटना का राजनैतिक रास कुछ इस कदर स्वादिष्ट है कि विदेश में देश पर चिंतन कर लौटे हमारे राज कुमार अस्पताल पहुंचे और क्योंकि इस देश का हर किसान मुझसे भी ज़्यादा ट्विटर पर वक़्त बिताता है, आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने ट्विटर पर अपना शोक व्यक्त किया। 


हर रोज़ संसद में और समाचार चैनलों पर भिन्न-भिन्न राजनीतिक पार्टियाँ एक-दूसरे पर किसान-विरोधी होने की छींटाकशी कर रहीं हैं और साथ ही में यह भी जता रही हैं कि उनसे ज़्यादा किसानों का हितैषी कोई दूजा नहीं। आप रोज़ सुनते होंगे कि सरकार से मुआवज़े की मांग भी हो रही है।  मगर एक अनोखी बात बताऊँ आपको, क्या आपने इस लेख के पहले वाक्य पर ध्यान दिया? अगर हाँ तो यह जान लीजिये कि इस मुआवज़े के मिल जाने से भी कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ेगा इस देश के किसानों पर। अधिक्तर किसान किसी और की ज़मीन पर खेती करते हैं और सरकारी नियम के मुताबिक मुआवज़ा खेत के मालिक को ही दिया जा सकता है और ऐसा इस लिए क्योंकि सरकार के अनुसार जमींदारी के खात्मे के बाद बटाई पर खेती मुमकिन ही नहीं है।  

कभी आपने सोचा कि हमारे अन्नदाता को राष्ट्रीय नीति निर्माण करते वक़्त नज़र अंदाज़ क्यों कर दिया जाता है? क्यों ऐसा होता है कि श्रीमान विजय माल्या को करोड़ों रुपये का ऋण माफ़ हो जाता है और एक गरीब किसान को चंद हज़ार रुपये के लिए अपनी जान देनी पड़ती है ? शायद ऐसा इस लिए क्योंकि इस देश की 60% (किसान) से भी ज़्यादा आबादी सकल घरेलू उत्पादन (GDP) में मात्र 14% का योगदान देती है जबकि मुझ जैसे लोग और शायद आप भी जो की किसी विदेशी कंपनी को अरबों $ का मुनाफा पहुँचाते हैंवे इसमें लगभग 65% का योगदान देते हैं।  आज के युग में एक देश की सफ़लता का पैमाना यही सकल घरेलु उत्पाद है लिहाज़ा ऐसा हो भी क्यों ना। 

इसका एक कारण और भी है और वो कारण हम और आप है। आप सोच रहे होंगे के आप कैसे? आपने तो कभी किसी किसान को आत्महत्या पर मजबूर नहीं किया। ही आप मदर इंडिया के सुखीलाला हैं जिसने सूत ले ले कर गरीबों की आर्थिक स्थिति चरमरा दी हो। यह सब करने के बावजूद भी आप ज़िम्मेदार हैं।  यह तो आज अगर हमारे शहरों में आकर, बीच मैदान में यह खेतिहर लटकने लगते तो हमारे लिए आज भी IPL में चेन्नई की जीत ज़्यादा महत्वपूर्ण होती।  जैसेलाख मर गए है वैसे हीलाख 10 हज़ार सही।  चैनल पलटते वक़्तमिनट देख लिया, इतना बहुत है। 


जबतक हम किसी सरकार और राजनीतिक पार्टियों को इस भयावह स्थिति का दंड नहीं देंगे ये हालात ऐसे ही रहेंगे। जब तक मेरे और आपके लिए सबका साथ सबका विकास मात्र एक 2 अंक की संख्या है (GDP) तब तक गरीब किसानोँ के बच्चे यूँ ही यतीम होते रहेंगे। इस देश के विकास का ठेका ज़रूर कुछ चंद लोगों के पास है पर वह विकास कैसा होगा, उसके मूल्य क्या होंगे, उससे आप और आपके देशवासी कैसे प्रभावित होंगे इसकी नैतिक ज़िम्मेदारी उन ठेकेदारों से कहीं ज़्यादा आपकी है।  एक बात ज़रूर याद रखेंप्रजातंत्र का ड्रामा तब तक ही सुरक्षित रहता है जब तक संपन्न और विपन्न के बीच का फ़र्क एक सीमा के अंदर बना रहता है।

Monday, 15 September 2014

वेदना

शायद आप सबको याद होगा के आज से कुछ साल पहले प्रिंस नाम का एक 5 साल का लड़का एक 60 फीट गहरे बोरवेल के गड्ढे में गिर गया था।  कुछ 48 घंटे चले बचाव कार्य के बाद उसे वहाँ से सुरक्षित निकाल लिया गया था।  इस किस्से के बाद कई और ऐसे किस्से होते रहे। कई बार बच्चे ऐसे गड्ढों में गिरते रहे।  कुछ सुरक्षित निकल आये पर कुछ मासूमों को दूसरों की लापरवाही की सज़ा भुगतनी पड़ी। आज भी मैं एक ऐसा ही किस्सा आपको बताने जा रहा हूँ पर यह किस्सा इन किस्सों जैसा हो कर भी इन जैसा नहीं है। 

बगलकोट, कर्नाटक में एक 5 साल का बच्चा कुछ दिन पहले 150 फ़ीट गहरे बोरवेल में गिर गया। यह उसके पिता के खेत का ही बोरवेल है। प्रशासन के 4 दिनों के भरसक प्रयास के बावजूद उसे निकाला नहीं जा सका। अब तक पढ़ कर आप यह सोच रहे होंगे के इसमें ऐसी कौन सी नई बात है ? हर दूसरे दिन ऐसी घटना होती है। और हर रोज़ अपने व्यस्त कार्यक्रम से 2 मिनट ऐसी घटनाओं पर शोक मनानां व्यर्थ है।


शायद इस ए. सी. कमरे में उस महँगी कुर्सी पर बैठे आप उस बच्चे के परिवारजनों की पीड़ा ना समझ पाएं। कुछ ऐसे ही मैं भी इस न्यूज़ आर्टिकल को नज़र अंदाज़ कर देता अगर मैंने आगे न पढ़ा होता। विचलित करने वाली बात यह हैं कि फसें हुए बच्चे के पिता ने सरकार से मांग की है कि वह राहत और बचाव काम को बंद कर दें। चार दिन में हताश हो चुके पिता को अब अपने खेत की चिंता है। उन्होंने यह खेत 12 लाख के क़र्ज़ पर लिया है और अगर बचाव के काम के लिए यूँ ही खुदाई जारी रही तो उनकी सारी फसल बेकार हो जाएगी।  

कुछ बेचैनी महसूस हुई अब आप को? ज़रा एक क्षण के लिए अपने आप को उस पिता की जगह रख कर  देखिये। एक पिता के नाते क्या आप ऐसा कदम उठा पायेंगे ? शायद नहीं ! क्या उस एक लड़के के लिए आप अपने बाकी परिवार के भविष्य को दाव पर लगा सकेंगे ?

ईश्वर न करे किसी पर भी ऐसा कुछ बीते मगर अब जब आप उस किसान की व्यथा भाँपने के प्रयास में असफल साबित हुए हैं तो चेतना के इसी पटल पर से इस देश के हालात देखिये। क्या अच्छे दिन यही हैं ? क्या यही वह महान भारत है जिसकी कल्पना हमारे पुर्खे कर गये थे? क्या यही वह आर्थिक शक्ति है जो दुनिया का रुख अपनी ओर मोड़ रही है? क्या यही 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा' है? 

ख़ैर सरकार या समाज को दोष देना इस लेख का उद्देश्य नहीं है। इस लेख का प्रयास आप के अंदर कुछ कर गुज़रने की भावना जगाना भी नहीं है। यह तो शायद मेरे अंतर्मन का उहापोह है। इस घटना और उस पिता की स्थिति सोच कर जब मैं अपने जीवन की किसी भी घटना को दुःख या निराशा के रूप में देखता हूँ तो मन विचलित हो उठता है।

Monday, 21 April 2014

A Letter to the Chief Election Commissioner

To,
The Chief Election Commissioner,
Election Commission of India,

Respected Sir,

I would like to take this opportunity to congratulate you and your team for the smooth conduct of the ensuing General Election so far. So much so I would also like to thank the Commission for raising the general awareness about the election and its processes among the citizens.

Of late, while going through a site (www.myneta.info) I found a comprehensive list of documents required to be submitted by a candidate while filing his / her nomination. A careful scrutiny of the list so provided intrigued me to the extent that I went through the ‘Handbook for Candidates’ published by the Election Commission. To my surprise, no rule or provision contained in this Handbook requires from the candidate to submit his agenda /manifesto/ action plan for the constituency he intends to represent at the time of filing the nomination paper. It makes a fundamental difference for an ordinary voter as he / she is not given a choice to choose candidate based on the merits of his action plans for the constituency. Thus two major stake holders have no consideration of common intents. May be, lack of such a substantive vision on the part of voter leaves no other option to him / her but to exercise his / her franchise on the basis of caste / religion / money or any other factor strong enough to influence his / her ordinary wisdom. It may not be out of place to mention that a major political party released its manifesto a day before the first day of polling. This acts as an impediment for the voter while choosing a candidate he / she deems fit for representing him / her.

Sir It raises a point of consideration whether or not it should be made mandatory for the candidates to file his constituency specific agenda of the work he / she plans to pursue, if elected. The candidate should also make public as to what recourse he / she would adopt to fulfill the promises so made. It will certainly restrict the candidate to promise moon on earth to his / her electorates this document must be brought in public domain by the Commission for electorates to consider, ponder over and facilitate their right to vote.

Further before the end of the elected candidate’s term (before the next election), a report should be published stating his / her achievements vis-a-vis the agenda submitted during nomination. This report will help the electorate gauge the merits of their choice and assist them in choosing the right candidate in the election to come.

Although I understand that publishing a report on the achievements of the candidates is not largely pragmatic, yet I am sure some mechanism can be evolved at your end for such an indexation.

As a young citizen of this country I feel duty bound to point out what better can be done to improve the system rather than cursing it. The way our Nation is changing, and has become ever ready to challenge the pitfalls in the system, fills me with the earnest hope that my voice will be heard judiciously.

I shall be grateful if the Commission could take out some time and reply to this letter.

Thanking you,

Yours faithfully,
Siddharth Mohan Misra,
A proud Indian.

Tuesday, 4 February 2014

जय सिया राम

Seneca, a famous Roman philosopher once said, "Religion is regarded by the common people as true, by the wise as false, and by the rulers as useful". These words written over 2000 years ago were never more true in spirit as they are now. Politicians are banking on stirred up religious sentiments to win the race to 7 Race Course Road.

In the 2002 Gujarat riots, humanity hit its rock bottom. There are accounts of mothers who witnessed swords being driven into their daughters genitals and their breasts cut off and thrown away; Sons who witnessed their fathers cut into half; Pregnant women being slaughtered and their fetus torn out and burnt; A well full of bodies of men, women and children being set alight. And these are just few accounts. There are many more horrifying stories.

Amidst all this madness, the police was nothing more than a spectator and at times a facilitator. N number of people reported to the National Human Rights Commission that when they went to the police for protection they met with a reply, "we don't have orders to protect you". Does a policeman need orders from his superior to protect a man from being burnt alive ? Probably something this human fades away in the police training.

Then there are accounts of those who were the ones with the sword. One of them recalls that day as one of the most proud and joyous day of his life. He says, "I felt like Maharana Pratap when I drove my sword into a pregnant woman and tore open her womb". The history taught in our schools has drastically gone wrong somewhere if this man thought of himself as the Great Maharana Pratap.

The man in charge of the state, the man who was responsible and accountable for protecting the people failed miserably during the darkest hours of humanity. The question whether he failed or chose to be a spectator is something for his conscience to decide, but his failure as the Chief Minister is evident without the slightest hint of doubt. So unlike normal people who fail and repent, this man went into an election and won with never before margins and may be in all probability, the next Prime Minister of India. But take a moment to think, the guy who failed (or chose to not act ) in controlling a few thousand men will control this great nation one day.

Anyhow neither has the chief minister apologized for what happened in Gujrat nor he has ever felt ashamed. But who should be ashamed the most for those days of lunacy? For me the answer is Lord Ram. The 'मर्यादा पुर्षोत्तम' Himself was called out by his followers when they were butchering their fellow beings. 'जय सिया राम' echoed amid the hue and cry of His creations. Once again the elections will be fought with slogans of 'जय सिया राम' and so called 'हिन्दुत्व' as the agenda when the word 'हिन्दुत्व' has nothing to do with religion. It only refers to people who belonged to the banks of the river 'सिंधु'. Anyway God has played a significant role in the politics of this country and will continue to do so. If only His followers could appreciate,'हरी व्यापक सर्वत्र समाना प्रेम ते प्रकट होई मैं जाना'.