"पाकिस्तान ज़िंदाबाद, भारत मुर्दाबाद", "कश्मीर मांगे आज़ादी, छीन के लेंगे आज़ादी" इत्यादि नारों ने एकाएक भारत के जन मानस के अंदर राष्ट्रवाद की एक लहर पैदा कर दी है। तमाम अवाम आज JNU में लगे इन नारों पर रोषित है और तत्काल प्रभाव से न केवल JNU को बंद देखना चाहती है बल्कि नारेबाज़ी करने वालों को कठोर से कठोर सज़ा भी दिलाना चाहती है। दिल्ली में कई ऑटो वाले तो JNU के छात्रों को पाकिस्तान उतारने की तीव्र इच्छा से ग्रसित हैं। कई टीवी चैनलों ने इस नारेबाज़ी के सानिध्य में देश के लिए जान की क़ुरबानी देने वाले सिपाहियों को ला खड़ा किया। यह दृश्य इस हद्द तक खींचा गया के एक थल सेना के सेवानिवृत सेनापति एक टीवी बहस के दौरान फूट फूट कर रो पड़े। इस प्रतिबिम्ब ने आम भारतीय के अंदर लगी राष्ट्रवाद की चिंगारी को लपट में तब्दील कर दिया। राष्ट्रवाद की यह लपट इस क़दर जन समान्य के अंतर्मन में फैली कि बहुत से लोगों ने न्यायालय के अंदर आरोपियों के साथ मार पीट को सही ठहराया । हाथ में भारत का झंडा लिए वकीलों का मीडिया कर्मीयों पर हमला न केवल जायज़ बल्कि देश भक्ति का उदाहरण करार दिया गया।
यह कैसा एक तरफ़ा आक्रोश है जो तब नहीं उठा जब पांच हज़ार से ज़्यादा गरीब किसान आत्मा हत्या कर रहे थे (कर रहे हैं) या तब कहाँ चला जाता है जब भारत विश्व के कुछ सबसे भूखे देशों में से एक साबित होता है या फिर तब क्या होता है इस राष्ट्रवाद की अग्नि का जब देश में एक साल में चौबीस हज़ार से अधिक महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं सामने आती हैं। आपके अंदर का यह कैसा राष्ट्रवाद है जो तब नहीं रोषित होता जब एक दलित मज़दूर आपके घर के सामने के नाले में अर्ध नग्न उतर कर आपका मल मूत्र अपने सर पर ढोकर साफ़ करता है। यह कैसा राष्ट्रवादी खून है जो तब नहीं खौलता जब चुनाव जीतने के लिए दंगे कराये जाते हैं या फिर आरक्षण की माँग के लिए गरीबों की दुकाने जला दी जाती हैं?
राष्ट्रवादी विचारधारा की मूल समस्या यही है के इसके लिए राष्ट्र सर्वोपरि है। इस कारण उसमें किसी भी खामी की गुंजाइश ही नहीं है। और हर वक़्त देश को विश्व का सबसे महान देश बताने की एक होड़ सी है। इसके कारण एक राष्ट्रवादी को देश की सिर्फ अच्छाई दिखती है उसकी कमियां नहीं।शायद इसी लिए राष्ट्रवादी लोगों को इन नारों से देश की प्रभुता पर खतरा मंडराता नज़र आ रहा है और बढ़ती आर्थिक असमानता से नहीं। यह अचंभे की बात नहीं के भारत का राष्ट्रगान लिखने वाले रबिन्द्रनाथ टैगोर राष्ट्रवाद को देश के लिए खतरा बता गए थे।
सामन्य जनता को देशभक्त के नाम पर राष्ट्रवादी बनाने की एक मुहीम सी है। देशभक्त सिर्फ वह ही नहीं जो देश के लिए अपनी जान दे, देशभक्त वह भी है जो अपने स्तर पर देश की अंतर्निहित समस्याओं को स्वीकार कर के उनके निवारण की चेष्टा करता है। देश भक्त वह है जो गाँधीजी की अहिंसा एवं सौहार्द की शिक्षा का पालन करता है। जो देशवासियों को धर्म, लिंग, जाति अथवा आर्थिक श्रेणी के ऐनक से न देखे।
बहुत से सुशिक्षित, सुलझी विचार धारा के लोग भी राष्ट्रवाद की गोली खा कर अपने खून का दबाव बढ़ाये घूम रहे हैं। सोशल मीडिया पर अचानक देश के रक्षक बन बैठे हैं। कुछ ने अपने आप को न्यायपालिका मान कर लोगों को राष्ट्रवादी और वामपंथी (पिछले कुछ समय में इस शब्द का प्रयोग राष्ट्रद्रोही के पर्याय के तौर पर किया जा रहा है) होने का प्रमाणपत्र बाँटना शुरू कर दिया है। मेरा मानना है कि देश में तत्काल प्रभाव से दो नई संवैधानिक संस्थायें स्थापित करनी चाहिए। यह दोनों संस्थाएँ नागरिकों का वर्गीकरण करें। एक नागरिकों को राष्ट्रवादी / राष्ट्र द्रोही प्रमाणित करे और दूसरी साम्प्रदायक / धर्म निरपेक्ष प्रमाणित करे। इससे आम आदमी का काफी वक़्त बचेगा और तब शायद उसका ध्यान कुछ छुट्ट्कर ख़बरों की तरफ भी जाये। हो सकता है तब यह अनुभूति हो कि जहाँ एक तरफ डॉलर और महंगा हो गया वहीँ सड़क पर सो रहे मज़दूर की ज़िन्दगी कुछ और सस्ती। या शायद तब याद आएगा के माल्या साहब उसकी जेब से हज़ारों करोड़ ले कर चलते बने हैं। और कुछ नहीं तो ऊपर वाले की तरफ़ देख कर 80C के तहत छूट बढ़ने की एक प्रार्थना का वक़्त तो अवश्य ही मिलेगा।
आईये इस राष्ट्रवाद की मादकता से ख़ुद को मुक्त करें और देशभक्त बने। देश के संविधान और उसके सिद्धांतो की रक्षा करें। दूसरों के विचारों को सुनने का साहस रखें और अपने विचारों को बिना उत्तेजित हुए कहें। इस बात पर गर्व करें कि आप एक ऐसे देश में हैं जहाँ आपको अपने विचार प्रकट करने की आज़ादी है पर यह ज़रूर ध्यान रखें कि यह आज़ादी पूर्ण नहीं कर्तव्यबद्ध है। और हाँ कृपया देशवासियों को व्यर्थ में पाकिस्तान न भेजें।
