यहीं पर सफ़ेद चूड़ी दार सलवार कुर्ता पहने सावित्री जी हैं जो कि डेटाबेस की query में कहीं खोई हुई हैं। मध्य प्रदेश के भोपाल जिले की रहने वाली हैं वे। शादी हुए शायद २ या ३ साल हुए हैं और एक प्यारा सा बेटा भी है। पर कहीं न कहीं उनके माथे पर सिर्फ यह डेटाबेस की query ही नहीं पर जीवन की और भी परेशानियों ने लकीरों के रूप में डेरा डाल रखा है। शायद सुबह सासू माँ से कुछ कहा सुनी हो गई है या शायद कल देर से घर पहुँचने के कारण उनके पति पपर्मेश्वर ने कुछ बुरा कह दिया था।
दूसरी ओर बैठती हैं नेहा जी। कंपनी में नौकरी करते हुए अभी एक साल भी नहीं हुआ है। सुबह जल्दी ही आ जाती हैं और देर रात त
क काम करती हैं। पर अपनी उम्र के हिसाब से कुछ कम ही हंसती हैं। छुट्टी के दिन भी ऑफिस आती हैं। शायद अपने जीवन के अकेलेपन को ऑफिस के काम से भरने की कोशिश करती हैं।
उन्ही के बगल में कमलेश जी बैठते हैं। अभी शायद 40 वर्ष के ही होंगे पर 60 के नज़र आने लगे हैं। कमर के दर्द के बावजूद रोज़ आकर इस काली अकड़ी हुई कुर्सी पर बैठ जाते हैं। अकसर अगल-बगल वाले लड़के-लड़कियों पर झुंझुला उठते हैं। और शायद यह सही भी है, कई सालों से तरक्की नहीं मिली उन्हें। पर जो भी हो बड़ा ख्याल रखते हैं सबका। अकसर घर से मिठाई ला कर बाटते हैं।
ऐसे अनेकों लोग हैं यहाँ, पर शायद अभी तक किसी ने भी बाहर कुदरत की इस अनोखी बेला पर ध्यान नहीं दिया हैं, बाहर जा के इस अनोखे जश्न में शामिल होना तो दूर की बात है। शायद सिर्फ शनिवार को ही वे इस उल्लास को महसूस कर पाते हैं, पर बाकि दिनों का क्या? इस रोज़ मर्रा की भाग दौड़ ने कहीं ना कहीं बड़ी जल्दी ही इन सबके मनोस्थल को इस पथरीली झुलसायी हुई बंजर ज़मीन सा कर दिया है। सी.सी.डी. के उपकरणों से निकली हुई चाय और कॉफ़ी कब तक इस हकीकत से इन्हें दूर रखेगी यह देखने लायक होगा।
इन सब लोगों के बीच बैठे और अपने इस चमकीले उपकरण को देखते हुए मेरे अंतर मन में बस एक ही विचार गूँज रहा है, 'क्या यही हश्र होने वाला है मेरा?' बहरहाल मेरा जो होगा सो होगा अभी तो बस यह ही कामना है के इन सबके मन के सूखे पर जल्दी ही मेघराज मेहरबान हों और खुल के बरसा दे अब्र-ए-उल्लास को।