शायद आप सबको याद होगा के आज से कुछ साल पहले प्रिंस नाम का एक 5 साल का लड़का एक 60 फीट गहरे बोरवेल के गड्ढे में गिर गया था। कुछ 48 घंटे चले बचाव कार्य के बाद उसे वहाँ से सुरक्षित निकाल लिया गया था। इस किस्से के बाद कई और ऐसे किस्से होते रहे। कई बार बच्चे ऐसे गड्ढों में गिरते रहे। कुछ सुरक्षित निकल आये पर कुछ मासूमों को दूसरों की लापरवाही की सज़ा भुगतनी पड़ी। आज भी मैं एक ऐसा ही किस्सा आपको बताने जा रहा हूँ पर यह किस्सा इन किस्सों जैसा हो कर भी इन जैसा नहीं है।
बगलकोट, कर्नाटक में एक 5 साल का बच्चा कुछ दिन पहले 150 फ़ीट गहरे बोरवेल में गिर गया। यह उसके पिता के खेत का ही बोरवेल है। प्रशासन के 4 दिनों के भरसक प्रयास के बावजूद उसे निकाला नहीं जा सका। अब तक पढ़ कर आप यह सोच रहे होंगे के इसमें ऐसी कौन सी नई बात है ? हर दूसरे दिन ऐसी घटना होती है। और हर रोज़ अपने व्यस्त कार्यक्रम से 2 मिनट ऐसी घटनाओं पर शोक मनानां व्यर्थ है।
शायद इस ए. सी. कमरे में उस महँगी कुर्सी पर बैठे आप उस बच्चे के परिवारजनों की पीड़ा ना समझ पाएं। कुछ ऐसे ही मैं भी इस न्यूज़ आर्टिकल को नज़र अंदाज़ कर देता अगर मैंने आगे न पढ़ा होता। विचलित करने वाली बात यह हैं कि फसें हुए बच्चे के पिता ने सरकार से मांग की है कि वह राहत और बचाव काम को बंद कर दें। चार दिन में हताश हो चुके पिता को अब अपने खेत की चिंता है। उन्होंने यह खेत 12 लाख के क़र्ज़ पर लिया है और अगर बचाव के काम के लिए यूँ ही खुदाई जारी रही तो उनकी सारी फसल बेकार हो जाएगी।
कुछ बेचैनी महसूस हुई अब आप को? ज़रा एक क्षण के लिए अपने आप को उस पिता की जगह रख कर देखिये। एक पिता के नाते क्या आप ऐसा कदम उठा पायेंगे ? शायद नहीं ! क्या उस एक लड़के के लिए आप अपने बाकी परिवार के भविष्य को दाव पर लगा सकेंगे ?
ईश्वर न करे किसी पर भी ऐसा कुछ बीते मगर अब जब आप उस किसान की व्यथा भाँपने के प्रयास में असफल साबित हुए हैं तो चेतना के इसी पटल पर से इस देश के हालात देखिये। क्या अच्छे दिन यही हैं ? क्या यही वह महान भारत है जिसकी कल्पना हमारे पुर्खे कर गये थे? क्या यही वह आर्थिक शक्ति है जो दुनिया का रुख अपनी ओर मोड़ रही है? क्या यही 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा' है?
ख़ैर सरकार या समाज को दोष देना इस लेख का उद्देश्य नहीं है। इस लेख का प्रयास आप के अंदर कुछ कर गुज़रने की भावना जगाना भी नहीं है। यह तो शायद मेरे अंतर्मन का उहापोह है। इस घटना और उस पिता की स्थिति सोच कर जब मैं अपने जीवन की किसी भी घटना को दुःख या निराशा के रूप में देखता हूँ तो मन विचलित हो उठता है।