Tuesday, 23 April 2013

आते हैं गैब से ये मज़ामीं ख़याल में


इस लेक्चर में मैं हमेशा सोता हूँ, पर ना जाने क्यों आज आँख नहीं लग रही है। इधर-उधर देखाता हूँ तो ये ख्याल आया के शायद मेरे जैसे और भी हैं यहाँ। इनमे से कितने अपने मन में अपने ही रंगों से सुसज्जित किसी दुनिया में खोये हुए हैं। आइये इन ब्रह्माण्डों की सैर करें। 


दूर उस कोने में एक चटक लाल रंग की टी शर्ट पहने वो जो लड़का बैठा है पता नहीं तबसे छत की ओर क्यों देख रहा है। शायद खुली आँखों से कोई ख्वाब बुन रहा है। उसके पीछे वो अजीब से बाल वाला, कब से क्लास की दूसरी ओर बैठी उस लड़की को देख रहा है। हर क्लास में वो यही करता है। और अगर थोड़ी फुरसत हो तो देखिएगा उसके चेहरे पर वो मंद-मंद मुस्कान जो सहसा छलक आती है जब भी वो लड़की किताब से अपना चेहरा उठाती है। इसी लड़के के बगल में एक लड़की बैठी है जो कल रात अपनी सहेलियों के साथ बैठ कर लगायी गयी अपनी नेल पोलिश को निहार कर मुस्करा रही है। कल रात की बातों को ध्यान कर के वो खुश तो बहुत हो रही है पर कुछ ही दिनों में दोस्तों से बिछड़ने का ग़म भी उससे सता रहा है, इसी लिए शायद खुल के नहीं हँस पा रही है। 

कक्षा के बीचों बीच बैठे साहबज़ादे अपनी कलम को कागज़ पर कुछ इस तरह रफ़्तार दे रहे हैं जैसे गीली उंगलियों को झटक कर पानी छिड़क रहे हों। ग़ौर से देखा तो मालूम पड़ा के कलम से स्केच खींचा जा रहा था, एक वादी का जिस पर अभी अभी सूरज उदय हो रहा था। इन से थोड़ा ही आगे एक सज्जन बैठे हैं, बाल खुजलाते हुए भौतिकी की ना जाने कौन सी गुत्थी में खोये हुए हैं। इन दोनों से एक कतार ऊपर एक लड़का है खादी के कुर्ते में थोड़ा विचलित सा, उसकी कहानी पर गौर फरमाएं तो पता लगेगा के वो जिस मेस वर्कर को पढ़ाने जाता है आज उसका नतीजा आ गया और वो २ अंक से परीक्षा में फेल हो गया। 

आइये कक्षा के इस कोने में आयें। एक उदास सा, मुरझाया सा, गुडी-मुड़ी कमीज़ पहने जो लड़का सामने बैठा है वो आम तौर पर काफी खिलखिलाया करता है पर आज न जाने किस घटना ने उसे ऐसा कर दिया है। खोज-बीन से मालूम हुआ के उसके पिताजी की तबीयत अचानक ख़राब हो गई है और वो २ दिन बाद शुरू होने वाली परीक्षा की वजह से उन तक नहीं पहुँच पा रहा है। आइये सामने बैठी इन मोहतरमा को देखें। बहुत कुछ लिख रही है ये, पर एक क्षण गौर तो कीजिये, यह क्या, यह तो एक स्पीच लिख रही हैं रोमियो और जूलिएट की और बीच-बीच में नज़रें चुरा कर कक्षा की दूसरी ओर भी देख रही हैं। अब समझ में आया, वो उलझे बाल वाला लड़का है इस स्पीच का रोमियो।

देखा आपने कैसे हम लोग 'लॉजिक' की इस दुनिया में खो कर सिर्फ 1 और 0 ही देख पाते हैं। ना दो धड़कते दिल एक दुसरे को सुन पाते हैं न ही कोई उस उभरते कलाकार को सराहता हैं, ना ही उस खादी के पीछे छुपी निराशा हटाने का कोई प्रयास करता है और अचंभित करने वाली बात तो ये है के बगल में बैठे हुए मित्र न सही, सहपाठी की जीवन की इतनी बड़ी विपदा पर हम और आप ग़ौर तक नहीं फरमाते।

बड़ी ही रंगीन दुनिया सजी है यहाँ। आँखें चौंधिया देने वाली चमक है इसमें, इन रंगों में डूबे हुए मेरी तो बस एक ही तमन्ना है के काश कोई मेरी ही तरह इस वक़्त मेरी इस दुनिया में गोते लगा रहा हो। 

Tuesday, 2 April 2013

Why do we have shadows ?


A trivial question which anyone with rudimentary knowledge of optics can answer. A shadow is an area where direct light from a light source cannot reach due to obstruction by an object.

Ironically many consider it as their soul mate. A soul mate who is absent in the darkest of hours. A soul mate which continuously keeps morphing while one moves from one light source to another on the road of life. And in the most timorous manner hides under one's feet when the scorching sun unleashes it's terror. 

It owes it's genesis to an obstruction. A massive collision between lightening fast
photons and the object. Try and grasp the fact that this progeny of conflict follows us almost everywhere.

Looking at the positive side, it is this shadow which caresses away the burning heat when under a tree during summers. Interestingly something which has no existence of it's own has the power to modulate temperature. Ponder over the previous thought with your physics caps off. It is baffling to absorb the fact that something so insignificant can have such a profound effect on it's surroundings. 

On an astronomical scale the shadow of the moon on the sun or that of the earth on the moon results into some spectacular scenes with some interesting astrological consequences. 

But the question still remains unanswered. It looked pretty bagatelle when I began but the more I think the more convoluted this appears to me. Probably you should also give it a try. Why do we have shadows ?