Saturday, 30 March 2013

कहूँ किससे मैं के क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है


वो पहली मुलाक़ात की उसकी हँसी मुझे आज भी याद है। वो रुक्सार पर छाई लालिमा आज भी मदहोश कर देती है मुझे। उसके मासूम स्पर्श से तो कलियाँ तक झूम उठी थीं, चिड़ियाँ चहचहा कर दूर गगन में जा उड़ी थीं। उसका साथ मेरे रोये रोये को प्रफुल्लित कर देता था। सोचा था के उसके तेज में मेरी खामिया छुप जाएगी। उसका हाथ थाम लिया तो बड़ी सी बड़ी विपदा भी मेरे रास्ते से हट जायेगी।

कुछ समय तक तो बिलकुल ऐसा ही हुआ। पर जैसे जैसे वक़्त बीता उसका मिजाज़ बदलने लगा। समय के साथ साथ उसका तेज आक्रोश में बदलने लगा। उसकी कोमलता क्रूरता में बदलने लगी। वही कालियाँ जिन्हें कभी उसने प्रेम से सहलाया था आज उन्ही को वो ध्वस्त करने पर आमादा था। जहाँ भी जाता था लोगो को ठेस पहुँचा कर ही आता था। प्रेम के बादल छटते हुए प्रतीत होने लगे थे। मेरी मदहोशी अब गुम सी होने लगी थी। अब बात मेरी बरदाश्त के बाहार होने लगी।
मैंने आवेश में आ कर उसे खरी खोटी सुना दी। शायद कुछ ज़्यादा ही आक्रोशित था मैं। उसने कुछ देर तो क्रोध दिखाया पर फिर सहसा शांत हो गया। शायद उसे यह विश्वास ही नहीं हो रहा था के मैंने उसे बुरा भला कहा था।

मेरा क्रोध तो अभी भी शांत ना हो पाया था पर उसका तेज न जाने कहा खो गया। उसका अस्तित्व ही कहीं गुम हो गया। अपने आवेश में मैं यह सब देख ही नहीं पाया था। उसका साथ मुझे अब एक गलती प्रतीत होता था। कोप में मैं अँधा सा हो गया था।

पर सहसा उसे यूँ मुड़ कर जाते देखा मेरा अहंकार चकना चूर हो गया। एक अजीब सी टीस उठी मेरे दिल में। उसे जाते देखना नश्तर की तरह चुभ रहा था मुझे। अहम् की बेड़ियाँ तोड़ते हुए मैंने उसे रोकने की हर मुमकिन कोशिश की। हर ईश्वर से प्रार्थना की पर वो न रुका। जल समाधी ले ली उसने। उस नदी में। लाचार सा मैं बस देखता रहा। अन्दर ही अन्दर कुढ़ता रहा। डूब गया मेरा 'सूरज'|  

कुछ नहीं बचा है अब, ना वो ऊष्मा ना वो लालिमा और ना ही चिड़ियाँ हैं अब आसमान में जो कि इस आँधी में बिखरे हुए हुए मन में तिनकों को फिर से जोड़ दे। हर तरफ अँधेरा हैं। बैठा हूँ मैं इस अन्धकार में न केवल अपना बल्कि अपने साये तक का वजूद खॊये हुए। एक उजड़ा हुआ मन बचा हैं और साथी के नाम पर उम्र भर की तन्हाई है। यह सन्नाटे की गूंज बहरा कर रही है मुझे। लौट आओ ऐ 'आफताब' बचा लो मुझे इस दम घोटती रात से।

Wednesday, 13 March 2013

किताब-ए-माज़ी के औराक उलट के देख ज़रा


आज एक अरसे बाद कक्षा ७ की हिंदी की पुस्तक देखी। रंगों की भरमार थी उसमें। अगर आपने कभी होली के दिन सड़क पर गौर किया हो तो कुछ वैसी ही रंग बिरंगी थी वो। 

पेंसिल की वो टेढ़ी-मेढ़ी लकीरे, वो चित्रों में पुरुषों की कलम से खींची गयी मूंछे, वो हर व्यक्ति के चेहरे पर ऐनक, अचानक ही यादों का एक सैलाब ले आया। 


अब कॉलेज में बस किताबें मोटी होती जा रही है और फॉण्ट छोटे। चित्रों के नाम पर तो बस कुछ अजीब से आकार ही बचे हैं वोह भी 90* के कोड़ पर तैनात २ रेखाओं  के बीच फंसे हुए अपना दम तोड़ रहे हैं। अगर बचपन में इन्हें देखा होता तो क्या ठहाके लगा कर हँसे होते। sine वक्र रोलर कोस्टर लगता और tan फिसलने वाला झूला। पर आज तो इन्हें देख कर सिर्फ इनका integration या differentiation ही नज़र आता हैं। और ऐसा हो भी क्यों ना कल्पना की उड़ान खत्म करने में पुरे 2 दशक लगाये हैं हमने। 

12 साल ABCD पढ़ने का क्या फायदा हुआ जब आज सारी किताबे αβγθ से लत-पथ हैं। 

ख़ैर जाने दीजिये, जाइये डूब जाइये उन मोटी पोथियों में। आखिर पेट तो इन्ही को घोटने से भरेगा। पर जाते जाते ये विचार अपने साथ ले जाइये, क्या याद नहीं आती आपको वो 'काबुलीवाला' की कहानी, वो दुनिया भर का ज्ञान समेटे कबीर और रहीम के दोहे?