Friday, 25 August 2017

आज़ादी का long weekend

"वाराणसी से चल कर प्रतापगढ़, रायबरेली, लखनऊ, मुरादाबाद के रस्ते दिल्ली को जाने वाली गाड़ी संख्या चौदह हज़ार दो सौ सत्तावन काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस प्लेटफार्म नंबर छः पर आ रही है", सुनकर अपने अध्भीगे रुमाल से पसीना पोंछते हुए फिरदौस ने ख़ुद को आगे आने वाले लम्बे सफर के लिए बेमन से तैयार किया। 

यह कहना तो गलत होगा किआज़ादी की सत्तरवी वर्ष गाँठ मानाने के लिए वह घर आया था। सच तो यह है कि १५ अगस्त के 'long weekend' में कोई और योजना ना बन पाने के कारण लखनऊ आ गया था। लखनऊ तक के सफर का उसका आंकलन औसत था। गुडगाँव से वातानुकूलित टैक्सी से दिल्ली, वहां से 'duplicate' लखनऊ मेल के AC ३ टियर से चारबाग़ और फिर एक वातानुकूलित टैक्सी से घर। घर तक के रास्ते में वो सोच रहा था, "यह ट्रेन का सफर अब दिन पर दिन कठिन होता जा रहा है, न ठीक से बर्थ पर अटता हूँ,  ऊपर से कमर भी दुःख जाती है। इस बार वापसी में पिताजी को बोलूंगा कि गाड़ी दे दें", सोचते हुए फिरदौस के मन में उत्साह की लैहर दौड़ गयी। गाड़ी के ख्याल ने कुछ और भी पुलाओ पकाया, मानो अब तो गुडगाँव की सड़कों का बेताज बादशाह बन बैठा हो। कल्पना की उड़ान तो यहाँ तक पहुंच गयी कि वापसी में स्वर्ण शताब्दी का टिकट तत्काल में कराने को उसने वैकल्पिक योजना ठैहरा दिया। 

झिझक और डर से भरे होकर भी उसने पिताजी के सामने अपनी माँ से चार पहिये की बात छेड़ दी। माँ ने तमतमाते हुए फिरदौस की अर्ज़ी ख़ारिज कर दी, पिताजी की कोई भी प्रतिक्रिया न आने पर फिरदौस उनका भी जवाब समझ गया। १४ अगस्त को सुबह १०:०० बजे शताब्दी का तत्काल टिकट करने का उसका प्रयास भी असफ़ल रहा। टिकट कराने की असफलता फिरदौस की गाड़ी प्राप्ति की अंतिम उम्मीद बन कर उसके मन को प्रफुल्लित कर गयी। इशारों-इशारों में उसने पिताजी से फिर गुहार लगायी पर उन्होंने अनसुना कर दिया। इस दिलेर कारनामे के चलते फिरदौस के पास अब गाड़ी तो छोड़िये, AC ट्रेन का टिकट भी न था। खाया पिया कुछ नहीं गिलास थोड़ा बारा आना उसे अपनी अवस्था पे चरितार्थ होता मालूम पड़ रहा था! हथियार डाल कर अब उसने ११:०० बजे 'sleeper' में टिकट कराने का फैसला किया। ऊपर वाले की अनुकम्पा से उसे आख़िर कशीविश्वनाथ में टिकट मिल गया। 

चारबाग़ स्टेशन पर ट्रेन आने का सन्देश हो चुका था। आज लखनऊ में ऊमस अपने चरम पर थी। पसीना था के रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। बहुत दिनों के बाद स्लीपर में चलने की कुछ खीज भी थी फिरदौस के मन में। कहाँ AC ३ को कष्टकारी समझने वाला कहाँ अब 'sleeper' में सफर करने जा रहा था। अनारक्षित डिब्बे के ठीक बगल में होने के कारण उसके डिब्बे में भी काफी भीड़ थी। दरवाज़े से करीब ४ लोग लटक रहे थे और किसी तरह उनको पार कर के अपनी बर्थ तक पहुंचने में ६-८ लोगों को और धक्का मारना पड़ा। उसकी बर्थ कोच में पहली थी। इस वजह से वहाँ लोगों की सँख्या और भी ज़्यादा थी। वहाँ पहुंचने पर बिना आरक्षण वाले यात्रियों को अपनी सीट से हटाना पड़ा। अपनी भाव भंगिमा से अपनी विरूचि प्रदर्शित करने में उन लोगों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। शीघ्र ही ट्रेन चल दी और वह अपनी ऊपर वाली बर्थ पर चढ़ गया। 




अपनी सम्पत्ति की सुरक्षा सर्वोपरि थी इस लिए उसने जूते पहन कर ही ऊपर चढ़ना श्रेष्ठ समझा। उमस का असर यहाँ भी बरक़रार था। कुछ देर किताब पढ़ी फिर झपकी आ गयी। रात करीब १२ बजे जब नींद खुली और प्रसाधन जाने का विचार किया तो पाया कि डब्बे में सब सो गए थे। उसकी तरफ की सबसे नीचे वाली बर्थ पर २ महिलायें सो रही थीं, उनके सामने वाली बर्थ पर एक सज्जन सो रहे थे और एक जनाब किसी तरह खुद को अकड़ू बर्थ के एक छोर पर फँसे हुए थे। ज़मीन पर चादर डाले एक लड़की सो रही थी। साइड बर्थ पर तो गज़ब ही दृश्य था, कुल ४ लोग लाशों की भांति एक-दूसरे पर पड़े थे, उनके ऊपर वाली बर्थ पर भी २ लोग और कुछ ४ बस्ते विराजमान थे। नीचे उतरते ही उसकी नज़र २ लड़कों पर पड़ी जो दरवाज़ा खोले पैर बाहर लटका कर ज़मीन पर बैठे थे। दोनों ही नींद की गिरफ़्त में थे और न जाने कैसे खुद को बाहर गिरने से रोक रहे थे। थोड़ा बढ़ने पर उसने पाया के कम्पार्टमेंट से निकलते ही एक महिला अपने बच्चे को लिए फर्श पे सो रही थी, उससे सटा हुआ कोच का कूड़ा दान था। उसके साथ ही दूसरे दरवाज़े तक शायद ५ लोग और थे। वह भी कुछ इसी अवस्था में थे। दोनों प्रसाधन के बीच की जगह में भी दो लोग काफ़ी चैन की नींद सो रहे थे। 

इन सबको लांघते हुए फिरदौस किसी तरह प्रसाधन कक्ष पंहुचा जो की बुरी तरह महक रहा था। वहाँ से लौटते वक़्त उसे ये अहसास हुआ कि सारे लोग जिन्हे उसने अभी २ बार लांघा वे न ही उसके कूच से विचलित हुए और न ही प्रसाधन की तीक्ष्ण दुर्गन्ध से। अपनी बर्थ पर वापस आ कर इस अनुभव के बारे में सोचने लगा। खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहा था। इन लोगों की व्यथा के आगे अपनी असुविधाओं की तुच्छता पर लाज आ रही थी उसे। "कहाँ मेरे लिए AC कोच न मिलना समस्या थी और दरवाज़े से लटके वह दोनों लड़के रात की ठंडी हवा में चैन से सो रहे हैं, कहाँ मुझे प्रसाधन की तीव्र दुर्गंद नाग़वार थी और कहाँ वो माँ है जो कूड़े दान के आगे भी अपनी संतान को अपनी छाती से लगाये थपकी देकर सुला रही है", उसने सोचा। जहाँ उसके मन में अकेले लखनऊ से दिल्ली अपनी चार पहिया गाड़ी से न जा पाने का ग़म था वहीँ  ४ लोगों का परिवार वाराणसी से दिल्ली तक का सफर एक बर्थ पर काट कर संतुष्ट था। ट्रेन के धक्कों से जहाँ एक तरफ उसका शरीर हिचकोले खा रहा था वहीं इन विचारों के तूफ़ान में उसका अन्तःकरण डूबता जा रहा था।

उसे पिछले ७० वर्षों में हुई प्रगति पर संशय हो रहा था। क्या हासिल हुआ आज़ादी, जनतंत्र, संविधान, सकल घरेलु उत्पाद (GDP) से उन लोगों को जो शौचालय के सामने लेटे हुए थे? अच्छे दिनों का सपना उसे अपनी आँखों के सामने दम तोड़ता हुआ नज़र आ रहा था। क्या यही नेहरू जी के 'tryst with destiny' का प्रतिबिम्ब था? निराशा के अन्धकार में उसका मन डूबने लगा। अपने कष्टों और सहयात्रियों की विषमताएं देख कर उसे भारत और इंडिया का अन्तः भेद महसूस हो रहा था।  

वह उठ कर बैठा और दरवाज़े पर लटके दोनों युवकों को देखने लगा। गाँधीजी के शब्द उसके मन में तैर रहे थे - 'there is enough on Earth for everybody's need, but not enough for everybody's greed' . उसने बर्थ पर अपना सामान एक तरफ समेटते हुए दोनों लड़कों को पुकारा, "ऊपर आ जाओ, ये बर्थ आधी ख़ाली है"। यह कह के फिरदौस गुड़िया के लेट गया। कब वह नींद में खो गया, पता ही नहीं चला। सुबह जब गाज़ियाबाद स्टेशन पर आँख खुली तो उसने देखा के उसके सामने एक लड़का दीवार की टेक लगाए और सामने वाली बर्थ प पाओं फसाये सो रहा है। ज़रा ध्यान से देखा तो एहसास हुआ कि यह वही लड़का है जो कल रात दरवाज़े से लटक रहा था। फिरदौस के चेहरे पर सहसा एक मुस्कान खेल गयी, और वो करवट बदल के दोबारा सो गया।