आज एक अरसे बाद कक्षा ७ की हिंदी की पुस्तक देखी। रंगों की भरमार थी उसमें। अगर आपने कभी होली के दिन सड़क पर गौर किया हो तो कुछ वैसी ही रंग बिरंगी थी वो।
पेंसिल की वो टेढ़ी-मेढ़ी लकीरे, वो चित्रों में पुरुषों की कलम से खींची गयी मूंछे, वो हर व्यक्ति के चेहरे पर ऐनक, अचानक ही यादों का एक सैलाब ले आया।
12 साल ABCD पढ़ने का क्या फायदा हुआ जब आज सारी किताबे αβγθ से लत-पथ हैं।
ख़ैर जाने दीजिये, जाइये डूब जाइये उन मोटी पोथियों में। आखिर पेट तो इन्ही को घोटने से भरेगा। पर जाते जाते ये विचार अपने साथ ले जाइये, क्या याद नहीं आती आपको वो 'काबुलीवाला' की कहानी, वो दुनिया भर का ज्ञान समेटे कबीर और रहीम के दोहे?

Aww .... nice!! engineering is too boring....i get that but nostalgic ... everyone would want to go back to the kabuliwala times ... :)
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